वैदिक काल की लव मैरीज

ये थी वैदिक काल की लव मैरिज !

ये थी वैदिक काल की लव मैरिज !

सोशल मीडिया पर यह ज्ञान देने वालों की कमी नहीं है कि प्रेम विवाह करने वालों या दूसरी जाति या धर्म के लोगों से विवाह करने वालों का यही हाल होता है। कई तो यहां तक कह जाते हैं कि प्रेम विवाह या अंतर-जातीय धर्म के ही खिलाफ है। मगर सीधे शब्दों में कहें तो ये ज्ञान शास्त्रों के खिलाफ है। सनातन धर्म की पहली लिखित रचना यानी ऋग्वेद में ही प्रेम विवाह का जिक्र मिलता है, वह भी सूर्य की पुत्री सूर्या का। सिर्फ यही नहीं, शादी से पहले जिस कुंडली के मिलान को जरूरी माना जाता है उसके हिसाब से भी जाति या वर्ण के मिलान की कोई व्यवस्था नहीं है।

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रही बात दूसरे धर्म में विवाह की तो इसका भी इतिहास पुराना है। सिकंदर के साथ यूनान से आए जो लोग यहां रह गए उन्हें न सिर्फ उनके कर्म के आधार पर क्षत्रिय वर्ण में शामिल किया गया बल्कि यहां उन्होंने शादी की और घर भी बसाए। भारत के सबसे पुराने ग्रंथों में लव मैरिज और अंतर-जातीय विवाह के बारे में क्या लिखा है। वेदों के मुताबिक जन्म से नहीं ज्ञान और कर्म से तय होता है वर्ण, ऋग्वेद में जिस वर्ण व्यवस्था की बात कही गई है उसका आधार जन्म नहीं है। ब्राह्मण या पुरोहित बनने के लिए भी वेद और मंत्रों का ज्ञान जरूरी था, सिर्फ ब्राह्मण कुल में जन्म नहीं। लेकिन जब तक ऋग्वेद ने ग्रंथ का रूप लिया तब तक वर्ण व्यवस्था को जन्म से जोड़ने के प्रयास हावी होने लगे थे।

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वैदिक युग में शादी के रहे प्रावधान

वैदिक युग से लेकर मध्यकाल तक अंतर-जातीय शादियों के लिए कोई न कोई प्रावधान सामाजिक और धार्मिक ढांचे में रखा गया था। मगर जैसे-जैसे वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म के बजाय जन्म बना, यह प्रावधान खत्म होते गए। 1872 में अंग्रेज सरकार ने अंतर-जातीय शादियों को मान्यता देने के लिए एक्ट-III बनाया था। इसे बनाने वाले कानून विशेषज्ञ हेनरी समर मेन थे। इस कानून के तहत दूसरी जाति के लोगों से शादी करने की इच्छा रखने वाले सिविल मैरिज कर सकते थे। अंग्रेजों के 1872 के एक्ट-III के आधार पर भारत सरकार ने 1954 में स्पेशल मैरिज एक्ट बनाया था।

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अंतर-धार्मिक विवाहों का इतिहास 

हिंदू मैरिज एक्ट और मुस्लिम पर्सनल लॉ से अलग यह एक्ट उन लोगों के लिए हैं जो अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक शादी करना चाहते हैं। हालांकि इस एक्ट के तहत शादी से पहले 30 दिन के नोटिस और लड़के-लड़की के डीटेल समेत नोटिस को सार्वजनिक करने के प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अभी जारी है। अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाहों का इतिहास पुराना हैं।

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भारत में दूसरी जाति या दूसरे धर्म में भी शादी करने का इतिहास बहुत पुराना है। प्रेम विवाह का इतिहास वैदिक काल जितना पुराना है तो अंतर-जातीय विवाह मध्यकाल से भी पहले से होते आ रहे हैं। दूसरे धर्म में शादियां यूनानियों के समय से हो रही हैं। समय के साथ इन शादियों का विरोध बढ़ा और अब स्थिति यहां तक आ गई है कि सरकारी मंजूरी के बावजूद इन शादियों को सामाजिक मान्यता हमेशा नहीं मिल पाती है। वैदिक इतिहास विवाह को सबसे पवित्र यज्ञ मानता है। साथ ही इसके लिए सिर्फ स्त्री और पुरुष की मंजूरी को ही प्राथमिकता दी गई है। ऐसे में आज सोशल मीडिया पर प्रेम विवाह के पक्ष और विपक्ष में चल रही बहस को हमारे असली इतिहास के नजरिये से देखना जरूरी है।


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