Upholds Anticipatory Bail: प्रयागराज में नाबालिग छात्रों के कथित यौन उत्पीड़न से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद को देश की सर्वोच्च अदालत से बहुत बड़ी कानूनी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों संतों की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) को रद्द करने की मांग करने वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर पूरी तरह रोक बरकरार रहेगी। इस मामले में शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी को शीर्ष अदालत से तगड़ा झटका लगा है, जिन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जमानत देने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। शंकराचार्य के समर्थकों और विधि दल ने इस निर्णय को ‘सत्य की जीत’ बताया है।
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क्या है पूरा मामला? महाकुंभ और माघ मेले के दौरान लगे थे आरोप
इस पूरे विवाद की शुरुआत उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर प्रयागराज से हुई थी। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने आरोप लगाया था कि महाकुंभ 2025 और माघ मेला 2026 के दौरान मठ के शिविर में रहने वाले कुछ नाबालिग छात्रों का यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) किया गया था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रयागराज की विशेष पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने स्थानीय पुलिस को तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने के कड़े निर्देश जारी किए थे। विशेष अदालत के इस कड़े रुख के बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट का रुख
इस मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत 25 मार्च 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ (Single Bench) ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य की अग्रिम जमानत याचिका पर विस्तृत सुनवाई की थी। हाई कोर्ट ने मामले के विभिन्न पहलुओं को देखने के बाद दोनों को कुछ शर्तों के साथ अग्रिम जमानत दे दी थी और पुलिस द्वारा की जाने वाली तात्कालिक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।
इसी आदेश को रद्द कराने और दोनों संतों को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की मांग को लेकर शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के तर्कों को सही माना और निचली अदालत या हाई कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह का दखल देने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
दोनों पक्षों की दलीलें
इस मामले में अदालती कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों की ओर से बेहद तीखी दलीलें पेश की गईं— पुलिस सूत्रों और अभियोजन पक्ष का कहना था कि मामले की विवेचना के दौरान दो पीड़ित बच्चों के धारा 164 के तहत कोर्ट में बयान दर्ज कराए गए थे। इसके साथ ही उनकी मेडिकल रिपोर्ट में भी दुर्व्यवहार और प्रताड़ना की पुष्टि होने की बात कही गई थी।
दूसरी तरफ, शंकराचार्य के वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एन. मिश्रा ने इन आरोपों को काल्पनिक और झूठा करार दिया। उन्होंने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पुख्ता तर्क दिया कि जिस पीड़ित लड़के के आधार पर यह पूरी कहानी रची गई है, वह लड़का कभी भी शंकराचार्य के मठ या शिविर का हिस्सा रहा ही नहीं।
यह पूरा घटनाक्रम शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की बढ़ती सामाजिक और धार्मिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए विरोधियों और कुछ प्रशासनिक तत्वों द्वारा रची गई एक गहरी और सोची-समझी साजिश है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम मुहर के बाद संतों के पक्ष ने राहत की सांस ली है।










