BHU Exam Controversy : यूपी में ‘ब्राह्मण’ पर फिर बवाल, बीएचयू पेपर के सवाल पर भड़के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद

BHU Exam Controversy : वाराणसी स्थित प्रतिष्ठित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार विवाद की वजह एमए इतिहास के चौथे प्रश्न पत्र में पूछा गया एक संवेदनशील सवाल है। परीक्षा के दौरान छात्रों से पूछा गया कि “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति को कैसे बाधा पहुंचाई?” जैसे ही यह सवाल सामने आया, सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक जगत तक तीखी बहस छिड़ गई है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों से लेकर छात्रों तक ने इस प्रश्न को पूरी तरह से गलत और पक्षपातपूर्ण बताते हुए अपना विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है।

BHU Exam Controversy

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 20, 2026

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BHU Exam Controversy : वाराणसी स्थित प्रतिष्ठित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार विवाद की वजह एमए इतिहास के चौथे प्रश्न पत्र में पूछा गया एक संवेदनशील सवाल है। परीक्षा के दौरान छात्रों से पूछा गया कि “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति को कैसे बाधा पहुंचाई?” जैसे ही यह सवाल सामने आया, सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक जगत तक तीखी बहस छिड़ गई है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों से लेकर छात्रों तक ने इस प्रश्न को पूरी तरह से गलत और पक्षपातपूर्ण बताते हुए अपना विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है। हालांकि, इस संवेदनशील मामले पर जब कुलपति से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने फिलहाल इस विषय पर बाद में बात करने का हवाला देते हुए कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया।

वामपंथी विचारधारा और अकादमिक एजेंडे पर गंभीर आरोप

इतिहास विभाग की इस परीक्षा में पूछे गए विवादित सवाल को लेकर बीएचयू परिसर के भीतर असंतोष का माहौल है। छात्रों का स्पष्ट कहना है कि प्रश्न की भाषा न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि यह जानबूझकर समाज के एक विशेष वर्ग को निशाना बनाने और समाज में वैमनस्य फैलाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। वहीं, विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसर भी इस सवाल के औचित्य पर आपत्ति जता रहे हैं। ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर सुभाष पांडे ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह प्रश्न पूरी तरह से निराधार और मनगढ़ंत है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के प्रश्न पत्र तैयार करने वाले लोग वामपंथी विचारधारा से प्रेरित हैं और अकादमिक स्तर पर एक खास एजेंडा चलाने का प्रयास कर रहे हैं।

ब्राह्मण समाज और विवादों का पुराना सिलसिला

यह कोई पहला मौका नहीं है जब ब्राह्मण समाज को लेकर इस तरह का विवाद खड़ा हुआ हो। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिन्होंने सामाजिक और राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। कुछ समय पहले समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने एक सार्वजनिक चर्चा के दौरान ऐसी कहावत सुनाई थी, जिसमें ब्राह्मण समाज के लिए बेहद आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया गया था।

इसके अतिरिक्त, नेटफ्लिक्स की एक प्रस्तावित फिल्म/वेब सीरीज के टाइटल को लेकर भी देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुआ था, जिसमें ब्राह्मण समाज की धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया गया था। साथ ही, यूजीसी द्वारा शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नए नियमों पर भी सवर्ण संगठनों ने आपत्ति जताई है कि इनका दुरुपयोग सामान्य वर्ग को झूठे मुकदमों में फंसाने के लिए किया जा सकता है।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और फूट डालने वाली ताकतों को घेरा

इस पूरे मामले पर धार्मिक गुरुओं की प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। बीएचयू परीक्षा के इस सवाल पर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने सीधे तौर पर सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू समाज को जातियों में बांटने का खेल शुरू हो चुका है। एक जाति को दूसरी जाति के सामने खड़ा करके आपस में लड़ाया जा रहा है, जिससे अंततः पूरे हिंदू समाज का ही नुकसान हो रहा है। शंकराचार्य ने कड़े शब्दों में कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सदा से भगवान के अंग रहे हैं और रहेंगे। हिंदुओं के बीच फूट डालने की किसी भी कोशिश को देश का सनातन समाज पूरी तरह ठुकरा देगा।

काशी विद्वत परिषद की आपत्ति और विश्वविद्यालय प्रशासन का रुख

काशी विद्वत परिषद ने भी इस प्रश्न की प्रासंगिकता और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। परिषद के मंत्री और बीएचयू के प्रोफेसर विनय पांडे का मानना है कि इस तरह के बेबुनियाद प्रश्नों का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है और बीएचयू प्रशासन कभी भी ऐसे विवादित पाठ्यक्रम का पक्षधर नहीं रहा है। मामला बढ़ने पर इतिहास विभाग की प्रोफेसर अनुराधा सिंह ने भी अपनी राय रखते हुए कहा कि यह प्रश्न किस कालखंड को ध्यान में रखकर पूछा गया है, यह कहना कठिन है, लेकिन परीक्षाओं में ऐसे संवेदनशील और विवादित सवाल पूछने से बचा जाना चाहिए।

दूसरी तरफ, बीएचयू के छात्र अभिनव शंकर पांडेय का कहना है कि यह मामला अब केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अकादमिक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनाओं से जुड़ चुका है। छात्रों ने महामना मदन मोहन मालवीय की इस पावन बगिया में ऐसे किसी भी सनातन विरोधी पाठ्यक्रम को बर्दाश्त न करने का संकल्प लिया है।

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