CBSE OSM Controversy: डिजिटल मूल्यांकन के नाम पर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़? CBSE की OSM प्रक्रिया बनी चर्चा का विषय

सीबीएसई ने कक्षा 12 की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन हेतु 'डिजिटल ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) प्रणाली लागू की है। हालाँकि, स्कैनिंग में तकनीकी खराबी, धुंधली कॉपियां और पन्ने गायब होने जैसी शिकायतों के चलते यह नई व्यवस्था विवादों में घिर गई है

CBSE OSM Controversy

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

जून 2, 2026

CBSE OSM Controversy: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इस वर्ष कक्षा 12 की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में एक बड़ा तकनीकी बदलाव करते हुए ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) प्रणाली को पूर्णतः लागू किया है। इस डिजिटल व्यवस्था के तहत, शिक्षकों को भौतिक कॉपियों के बजाय कंप्यूटर स्क्रीन पर स्कैन की गई डिजिटल प्रतियां जांचने के लिए दी जाती हैं। हालांकि, इस प्रणाली के लागू होते ही विवाद भी शुरू हो गया है। कई छात्रों और अभिभावकों ने धुंधली कॉपियों, गायब पन्नों और गलत उत्तर पुस्तिकाओं के आवंटन जैसी गंभीर तकनीकी खामियों की शिकायतें की हैं। इन शिकायतों ने इस बहस को जन्म दिया है कि क्या सीबीएसई इस बड़े डिजिटल बदलाव के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह तैयार था।

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क्या है ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) और इसके उद्देश्य?

ऑन-स्क्रीन मार्किंग एक आधुनिक मूल्यांकन प्रक्रिया है। इसमें परीक्षा पारंपरिक तरीके से कागज पर ही होती है, लेकिन उत्तर पुस्तिकाएं जमा होने के बाद उन्हें उच्च-गुणवत्ता वाले स्कैनर से डिजिटल रूप में बदला जाता है। इसके बाद, छात्र की पहचान गुप्त रखकर इन डिजिटल फाइलों को देश भर के परीक्षकों के पास भेजा जाता है। सीबीएसई का तर्क है कि यह व्यवस्था मूल्यांकन को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और सटीक बनाती है। इसका मुख्य उद्देश्य मानवीय त्रुटियों (जैसे नंबर जोड़ने की गलती) को खत्म करना और विभिन्न क्षेत्रों के परीक्षकों के बीच अंकों में समानता लाना है। बोर्ड ने 2014 में भी इसे अपनाने का प्रयास किया था, लेकिन तब स्कैनिंग तकनीक उतनी उन्नत नहीं थी कि कॉपियों की बाइंडिंग को सुरक्षित रखा जा सके।

वैश्विक स्तर पर डिजिटल मूल्यांकन के मानक

दुनिया के कई बड़े परीक्षा बोर्ड पहले से ही डिजिटल मूल्यांकन का उपयोग कर रहे हैं। ब्रिटेन के ए-लेवल्स परीक्षाओं के प्रमुख बोर्ड जैसे AQA, OCR और Pearson Edexcel कई वर्षों से इस प्रणाली के जरिए परिणाम दे रहे हैं। वहां की पद्धति की एक विशेषता यह है कि एक शिक्षक को पूरी कॉपी जांचने के बजाय, केवल एक विशिष्ट प्रश्न (Question-based marking) दिया जाता है, जिससे अंकों की सटीकता बनी रहती है। इसी तरह, इंटरनेशनल बेकलॉरिएट (IB) बोर्ड, जो 150 से अधिक देशों में कार्य करता है, भी पूरी तरह डिजिटल मूल्यांकन पर निर्भर है, जहां सीनियर परीक्षक गुणवत्ता पर निरंतर निगरानी रखते हैं।

तकनीक बनाम मानवीय दृष्टिकोण

ब्रिटेन के परीक्षा नियामक ‘ऑफक्वाल’ (Ofqual) के अनुसार, ऑनलाइन मार्किंग का उपयोग गुणवत्ता नियंत्रण और परीक्षकों की निगरानी के लिए किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक केवल उत्तर पुस्तिकाओं को शिक्षकों तक पहुंचाने का एक कुशल माध्यम है, यह कभी भी शिक्षक के विवेक और इंसानी सूझबूझ का विकल्प नहीं बन सकती। परीक्षाओं में एआई (AI) और डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद, अंतिम मूल्यांकन का अधिकार इंसानों के पास ही रहना चाहिए।

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