CJI Suryakant Comment Controversy: CJI सूर्यकांत की टिप्पणी पर विवाद, पूर्व IAS और वकीलों ने जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की हालिया टिप्पणी पर देशभर में विवाद खड़ा हो गया है। विकास परियोजनाओं को रोकने वाली याचिकाओं पर की गई उनकी टिप्पणी के विरोध में पूर्व नौकरशाहों, 600 से अधिक नागरिकों और वकीलों ने खुली चिट्ठी लिखकर आपत्ति जताई है।

CJI Suryakant Comment Controversy

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

मई 26, 2026

CJI Suryakant Comment Controversy: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी ने कानूनी और सामाजिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विकास परियोजनाओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नाराजगी जताई थी। यह मामला 11 मई को गुजरात के पिपावाव बंदरगाह विस्तार को मिली पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई से जुड़ा है।

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CJI की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने तल्ख अंदाज में कहा कि देश में कोई भी परियोजना ऐसी नहीं है, जिसे तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने खुले दिल से स्वीकार किया हो। उन्होंने आगे कहा कि हर परियोजना को अदालत में घसीटा जा रहा है और इसका मकसद केवल विकास को रोकना है। यदि यही चलता रहा तो देश आगे कैसे बढ़ेगा?

पूर्व नौकरशाहों और वकीलों की आपत्ति

इस टिप्पणी के विरोध में पूर्व नौकरशाहों के मंच कॉन्स्टिट्यूशन कंडक्ट ग्रुप के 71 सदस्यों ने खुली चिट्ठी लिखी है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ऐसी टिप्पणियों से पर्यावरण संरक्षण कमजोर हो सकता है और निचली अदालतें भी इसी दृष्टिकोण को अपनाने लगेंगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पर्यावरण मंत्रालय के विशेषज्ञ निकाय केवल सरकारी अधिकारियों से भरे होते हैं और अक्सर रबर स्टैंप की तरह काम करते हैं।

नागरिक समाज और वकीलों का विरोध

इसके अलावा, देशभर के 600 से अधिक नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और 72 वकीलों व कानून छात्रों ने भी अलग से पत्र लिखकर इन टिप्पणियों को वापस लेने की मांग की है। उनका तर्क है कि ऐसी टिप्पणियों से पर्यावरण की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाले जागरूक नागरिकों को संदिग्ध श्रेणी में खड़ा किए जाने का खतरा है।

जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। जहां सुप्रीम कोर्ट विकास परियोजनाओं में बाधा डालने वाली याचिकाओं पर नाराज है, वहीं नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी टिप्पणियां पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को कमजोर कर सकती हैं। यह विवाद न्यायपालिका और समाज के बीच संतुलन की चुनौती को उजागर करता है।

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