Delimitation Bill 2.0: केंद्र सरकार एक बार फिर देश के चुनावी ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए कमर कस चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार ‘डिलिमिटेशन बिल 2.0’ (परिसीमन विधेयक) को नए कलेवर में पेश करने की तैयारी कर रही है। इस बार इस बिल को केवल परिसीमन तक सीमित न रखकर इसे ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (एक देश, एक चुनाव) के महत्वाकांक्षी प्रस्ताव के साथ जोड़कर एक ‘मेगा बिल’ के रूप में संसद में लाने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि इसे आगामी मॉनसून सत्र के दौरान पटल पर रखा जाए।
क्षेत्रीय दलों के साथ ‘बैकचैनल’ कूटनीति
बीते अनुभवों से सबक लेते हुए, इस बार सरकार किसी भी संवैधानिक चुनौती से बचने के लिए बेहद सतर्क है। सरकार का मुख्य लक्ष्य संसद में आवश्यक ‘दो-तिहाई बहुमत’ का आंकड़ा जुटाना है। इसे सुनिश्चित करने के लिए पर्दे के पीछे से क्षेत्रीय दलों को साधने की कवायद तेज हो गई है।
विशेष रूप से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसे बड़े क्षेत्रीय दलों के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत शुरू की गई है। रिपोर्टों के अनुसार, टीएमसी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस पहल को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं और वे परिसीमन के तकनीकी पहलुओं पर खुली चर्चा के लिए तैयार दिख रहे हैं। वहीं, पहले परिसीमन का कड़ा विरोध करने वाली डीएमके का रुख भी इस बार थोड़ा नरम नजर आ रहा है। वे अब केंद्र द्वारा लाए जाने वाले संशोधित प्रस्ताव का इंतजार कर रहे हैं, जो एक महत्वपूर्ण बदलाव है।
पिछली असफलताओं से सीखा सबक
सरकार की यह रणनीति बीते समय में हुई संसद की कार्यवाहियों का परिणाम है। याद रहे, 16 से 18 अप्रैल के बीच बुलाए गए तीन दिवसीय विशेष सत्र में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण बिल) को पारित कराने का प्रयास किया गया था। उस समय 529 सदस्यों में से 298 ने बिल का समर्थन किया, जबकि 230 सदस्यों ने इसका विरोध किया था। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 352 मतों (दो-तिहाई बहुमत) का जादुई आंकड़ा न जुटा पाने के कारण वह बिल अधर में लटक गया था।
उस विफलता को देखते हुए ही केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से आग्रह किया था कि ‘डिलिमिटेशन बिल 2026’ और ‘यूनियन टेरिटरीज लॉ (अमेंडमेंट) बिल, 2026’ को फिलहाल स्थगित कर दिया जाए। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि बिना व्यापक सहमति के किसी भी बड़े संवैधानिक प्रस्ताव को लाकर उसे फेल होने से बचाया जा सके।
क्या 2026 में बदलेगा चुनावी भविष्य?
सरकार का स्पष्ट मानना है कि अगर देश को अगले स्तर पर ले जाना है, तो चुनावी सुधार अपरिहार्य हैं। परिसीमन के जरिए संसदीय क्षेत्रों का नया पुनर्गठन और ‘एक देश, एक चुनाव’ के जरिए प्रशासनिक दक्षता लाना सरकार का मुख्य एजेंडा है। अब देखना यह होगा कि क्या केंद्र सरकार विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनाने में सफल हो पाती है। अगर यह सहमति बन जाती है, तो मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सत्रों में से एक साबित हो सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें सरकार और क्षेत्रीय दलों के बीच चल रही उन गुप्त वार्ताओं पर टिकी हैं, जो देश के आने वाले सालों की सियासी दिशा तय करेंगी।
राजस्थान हाईकोर्ट में आसाराम मामला: अंतरिम जमानत और जेल सुविधाओं पर सवाल










