Greenland Row : ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कड़ा रुख, जेडी वेंस की यूरोपीय देशों को चेतावनी

ग्रीनलैंड या 'युद्ध का मैदान'? जेडी वेंस की चेतावनी ने यूरोपीय देशों के उड़ाए होश! क्या अमेरिका अपने नाटो सहयोगी डेनमार्क पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है? उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कह दिया है कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा का ढांचा कमजोर है और यदि यूरोप इसे नहीं सुधारता, तो अमेरिका हस्तक्षेप करने पर मजबूर होगा। वेंस के "टेक ट्रंप सीरियसली" वाले बयान ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की आहट दे दी है।

Greenland Row

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 9, 2026

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Greenland Row : अमेरिकी राजनीति में इन दिनों ग्रीनलैंड को हासिल करने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने यूरोपीय नेताओं को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड संबंधी प्रस्ताव को महज एक बयान न समझें, बल्कि इसे पूरी गंभीरता से लें। वेंस के अनुसार, ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं है, बल्कि यह अमेरिका और पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य भौगोलिक स्थान बन चुका है। व्हाइट हाउस की प्रेस ब्रीफिंग में उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका अब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं है, खासकर तब जब आर्कटिक क्षेत्र में वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

मिसाइल डिफेंस के लिए ग्रीनलैंड का महत्व और ‘दुश्मन’ देशों का खतरा

जेडी वेंस ने ग्रीनलैंड को अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम की रीढ़ बताया है। उन्होंने तर्क दिया कि ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति ऐसी है कि वहां से पूरे विश्व के मिसाइल सुरक्षा तंत्र को नियंत्रित और सुदृढ़ किया जा सकता है। वेंस ने आगाह किया कि रूस और चीन जैसे ‘दुश्मन’ देश इस इलाके में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं और वहां की संपदा व सामरिक स्थिति में गहरी रुचि दिखा रहे हैं। उन्होंने यूरोपीय सहयोगियों, विशेषकर डेनमार्क से कहा कि वे इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर अपनी जिम्मेदारी समझें। यदि यूरोप इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहता है, तो अमेरिका को अपनी सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ेगा।

कूटनीति या सैन्य विकल्प? व्हाइट हाउस के बयानों से बढ़ी बेचैनी

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो जल्द ही डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं। वेंस ने कहा कि कुछ बातें सार्वजनिक रूप से कही जा रही हैं और कुछ कूटनीतिक रूप से निजी स्तर पर साझा की जाएंगी। हालांकि, सबसे चौंकाने वाला बयान व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट की ओर से आया है। उन्होंने CNN से बातचीत में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में ‘सैन्य शक्ति के इस्तेमाल’ की संभावना को भी खारिज नहीं किया गया है। राष्ट्रपति की टीम इसे आर्कटिक में दुश्मनों को रोकने की सर्वोच्च प्राथमिकता मान रही है।

नाटो (NATO) पर ट्रंप का तीखा हमला: सहयोगियों पर बढ़ता दबाव

ग्रीनलैंड के मुद्दे पर यूरोपीय देशों की असहमति के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो (NATO) संगठन पर भी निशाना साधा है। ट्रंप ने कहा कि नाटो पूरी तरह से अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति पर निर्भर है, लेकिन जब अमेरिका के सुरक्षा हितों की बात आती है, तो सहयोगी देश सहयोग करने में हिचकिचाते हैं। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का यह आक्रामक रुख उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ विजन का हिस्सा है, जहां वे अंतरराष्ट्रीय संधियों से ऊपर अमेरिकी हितों को रख रहे हैं। इससे अमेरिका और उसके पारंपरिक यूरोपीय सहयोगियों के बीच दरार और चौड़ी होती दिख रही है।

जेडी वेंस के इशारे के मायने: क्या कब्जे की तैयारी में है अमेरिका?

उपराष्ट्रपति वेंस के बयानों का गहरा विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका अब कूटनीति की मेज से आगे बढ़कर अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश कर रहा है। जेडी वेंस द्वारा डेनमार्क को दी गई चेतावनी कि “अमेरिका को कुछ करना पड़ेगा,” भविष्य में किसी बड़े भू-राजनीतिक बदलाव की ओर संकेत करती है। अमेरिका का असल निशाना आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस की गतिविधियों को पूरी तरह से ब्लॉक करना है। इसके लिए वह ग्रीनलैंड पर अपना नियंत्रण या कम से कम एक स्थायी और बड़ा सैन्य आधार चाहता है। वेंस के बयानों ने यह साफ कर दिया है कि ट्रंप प्रशासन इस लक्ष्य को पाने के लिए अपने सहयोगियों पर दबाव डालने से भी पीछे नहीं हटेगा।

आर्कटिक में शक्ति संतुलन की नई जंग

कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नया कुरुक्षेत्र बनता जा रहा है। एक तरफ जहां डेनमार्क इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है, वहीं अमेरिका इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बता रहा है। वेंस की चेतावनी ने यूरोपीय देशों को संकट में डाल दिया है। आने वाले हफ्तों में होने वाली कूटनीतिक मुलाकातें यह तय करेंगी कि यह मुद्दा बातचीत से सुलझेगा या दुनिया एक नए वैश्विक तनाव की गवाह बनेगी। अमेरिका का यह अडिग रुख संकेत देता है कि वह ग्रीनलैंड को हासिल करने के अपने संकल्प से पीछे हटने वाला नहीं है।

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