Holi 2026: इस वर्ष होली 3 और 4 मार्च को मनाई जाएगी। देशभर में इस त्योहार के दौरान रंग और गुलाल की धूम रहती है। हालांकि, इन आकर्षक और चमकीले रंगों के पीछे छिपे स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बाजार में उपलब्ध कई सिंथेटिक रंगों में भारी धातुएं, औद्योगिक डाई और हानिकारक रसायन मिलाए जाते हैं, जो त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। चिकित्सकों के अनुसार, इन रंगों के दुष्प्रभाव हल्की खुजली से लेकर गंभीर एलर्जी और सांस की तकलीफ तक हो सकते हैं। खासतौर पर अस्थमा, एलर्जी या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है।
त्वचा पर कृत्रिम रंगों का दुष्प्रभाव
सिंथेटिक रंगों में अक्सर सीसा, पारा, क्रोमियम और सिलिका जैसे हानिकारक तत्व पाए जाते हैं। ये रसायन त्वचा के संपर्क में आते ही जलन, लाल चकत्ते, खुजली और कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। जिन लोगों को पहले से एक्जिमा या अन्य त्वचा संबंधी रोग हैं, उनमें प्रतिक्रिया अधिक गंभीर हो सकती है। बार-बार ऐसे रंगों के संपर्क में आने से त्वचा शुष्क और अधिक संवेदनशील बन सकती है। कुछ मामलों में त्वचा पर दाग-धब्बे या स्थायी निशान भी रह सकते हैं। लंबे समय तक संपर्क रहने पर त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा परत भी कमजोर पड़ सकती है।
आंखों के लिए रंग कितने सुरक्षित?

होली खेलते समय अक्सर रंग आंखों में चले जाते हैं, जिससे जलन, सूजन और लालिमा हो सकती है। कई बार कंजंक्टिवाइटिस या कॉर्नियल एब्रेशन जैसी समस्याएं सामने आती हैं। रंगों में मौजूद अम्लीय या क्षारीय तत्व आंखों की नाजुक सतह को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यदि समय पर उपचार न मिले तो संक्रमण बढ़ सकता है और दृष्टि पर भी प्रभाव पड़ सकता है। कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि पाउडर रंग लेंस के पीछे फंसकर संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है। पहले भी ऐसे मामलों में गंभीर आंखों के संक्रमण देखे जा चुके हैं।
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फेफड़ों और श्वसन तंत्र पर प्रभाव
सूखे रंग हवा में आसानी से उड़ जाते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। कई रंगों में कीटनाशक, एस्बेस्टस और भारी धातुओं के अंश पाए जाते हैं। इन्हें सांस के साथ अंदर लेने पर अस्थमा का दौरा, ब्रोंकाइटिस, राइनाइटिस, सीने में जकड़न और घरघराहट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। लगातार संपर्क से श्वसन नलिकाओं में सूजन आ सकती है और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) का खतरा भी बढ़ सकता है। अस्थमा या एलर्जी से पीड़ित लोगों को विशेष रूप से सूखे रंगों से दूर रहना चाहिए। यदि गलती से रंग निगल लिया जाए या अधिक मात्रा में शरीर में प्रवेश कर जाए, तो यह किडनी और लीवर को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ औद्योगिक डाई के लंबे संपर्क से कैंसर का जोखिम भी जुड़ा हुआ माना जाता है। गर्भवती महिलाओं को तो खास तौर पर सतर्क रहने की सलाह दी जाती है।
सुरक्षित और स्वस्थ तरीके से होली मनाने के उपाय
होली को सुरक्षित बनाने के लिए प्राकृतिक या हर्बल गुलाल का चयन करें। त्योहार से पहले त्वचा और बालों पर सरसों या नारियल का तेल अथवा मॉइश्चराइजर लगाएं, ताकि रंग सीधे त्वचा में न समाए। पूरे बाजू के कपड़े पहनें और आंखों की सुरक्षा का ध्यान रखें। होली के दिन कॉन्टैक्ट लेंस लगाने से बचें। रंग लगने के तुरंत बाद साफ पानी से धो लें और त्वचा को रगड़ने से बचें। अधिक धूल-धक्कड़ और भीड़भाड़ वाली जगहों पर खेलने से परहेज करें।










