Masoud Pezeshkian Resigns: पश्चिम एशिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक, ईरान की राजनीति से इस वक्त बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान ने कथित तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और अपना त्याग पत्र देश के सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) अयातुल्ला अली खामेनेई के कार्यालय को भेज दिया है। इस खबर के सार्वजनिक होते ही न केवल ईरान के घरेलू राजनीतिक गलियारों में भूकंप आ गया है, बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में भी जबरदस्त खलबली मच गई है। दुनिया भर के रणनीतिकार अब ईरान के इस अप्रत्याशित कदम के दूरगामी परिणामों का आकलन करने में जुट गए हैं।
सुप्रीम लीडर को भेजा गया कड़ा पत्र
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि देश के सुप्रीम लीडर द्वारा इस इस्तीफे को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह ईरान में सिर्फ एक सामान्य प्रशासनिक या सरकार का बदलाव नहीं माना जाएगा। बल्कि यह ईरान की रूढ़िवादी सत्ता के भीतर लंबे समय से चल रहे बेहद गहरे और गंभीर आंतरिक सत्ता संघर्ष का सबसे बड़ा सार्वजनिक प्रमाण बनकर सामने आएगा। यह घटना दर्शाती है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व और चुनी हुई सरकार के बीच मतभेद अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं जहां से वापसी मुमकिन नहीं लग रही है।
नीतिगत फैसलों से अलग-थलग किए जाने पर राष्ट्रपति ने जताई अपनी गहरी नाराजगी
मीडिया संस्थान ‘ईरान इंटरनेशनल’ की हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान ने रविवार को देश के सर्वोच्च कार्यालय को भेजे अपने त्याग पत्र में बेहद कड़े और आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने अपने पत्र में देश की व्यवस्था पर साफ तौर पर यह गंभीर आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति और उनके द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार को ईरान के बड़े, रणनीतिक और नीतिगत फैसलों से पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है। देश को चलाने वाली मुख्य नीतियां तय करने में सरकार की राय को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
बिना वास्तविक शक्तियों के संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाने में राष्ट्रपति ने जताई असमर्थता
मसूद पेजेशक्यान ने अपने इस्तीफे में देश की आंतरिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए लिखा कि मौजूदा माहौल में वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। उन्होंने बेबाकी से कहा कि देश का सर्वोच्च प्रशासनिक पद होने के बावजूद उनके पास शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कोई वास्तविक शक्ति या अधिकार नहीं बचे हैं। अपनी बेबसी जाहिर करते हुए राष्ट्रपति ने तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने की इच्छा जताई है, जिससे यह साफ है कि ईरान का प्रशासनिक गतिरोध अब पूरी तरह से असहनीय स्तर पर पहुंच चुका है।
विवाद की मुख्य जड़: इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का बढ़ता वर्चस्व
इस पूरे अभूतपूर्व राजनीतिक विवाद और गतिरोध की मुख्य जड़ में ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के लगातार बढ़ते प्रभाव और दखल को बताया जा रहा है। मसूद पेजेशक्यान का सीधा आरोप है कि IRGC के भीतर सक्रिय कट्टरपंथी धड़ों ने देश के शासन, अर्थव्यवस्था और महत्वपूर्ण नीतिगत हिस्सों पर अपना प्रभावी और एकतरफा नियंत्रण स्थापित कर लिया है। पिछले कई महीनों से लगातार ऐसी खबरें और खुफिया रिपोर्ट्स आ रही थीं कि देश की सैन्य और सुरक्षा एजेंसियां चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार और राष्ट्रपति के कानूनी अधिकारों को लगातार सीमित करने की कोशिशों में जुटी हुई थीं।
प्रशासनिक फैसलों में गतिरोध और अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत पड़ी ठप
सरकार और सैन्य ताकतों के बीच जारी इस तीखे टकराव के कारण न केवल ईरान के महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले लंबे समय से अटके हुए हैं, बल्कि कैबिनेट में जरूरी फेरबदल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली कूटनीतिक बातचीत भी पूरी तरह से ठप पड़ गई है। यह आंतरिक संकट ऐसे संवेदनशील समय में आया है जब ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले ही कई मोर्चों पर बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ गया है।
अमेरिका को होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की कड़ी चेतावनी और ट्रंप का पुराना दावा
इस तनाव के बीच, ईरान ने हाल ही में अमेरिका को सख्त चेतावनी देते हुए कहा था कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले विदेशी जहाजों से भारी पर्यावरण शुल्क वसूलने की बड़ी तैयारी कर रहा है। इसके अलावा, अमेरिका के साथ परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही संभावित समझौते की बातचीत के ऐन वक्त बीच में ही राष्ट्रपति के इस इस्तीफे ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की स्थिति को बेहद कमजोर और नाजुक कर दिया है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बहुत पहले यह दावा किया था कि ईरान का पूरा सत्ता ढांचा अंदरूनी तौर पर बेहद कमजोर और बुरी तरह से बंटा हुआ है, जो अब सच साबित होता दिख रहा है।
Read More : Suman Kalyanpur Death : नहीं रहीं दिग्गज गायिका सुमन कल्याणपुर, नवासी साल की उम्र में ली अंतिम सांस










