क्या UP मे Mayawati का राजनैतिक अस्तित्व खतरे में…

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Is Mayawati’s political existence in danger in UP?

क्या UP मे मायावती का राजनैतिक अस्तित्व खतरे में…

इन दिनों उत्तर प्रदेश का राजनैतिक गलियारा उठा पटल के दौर से गुजर रहा है। लेकिन इन सबके बीच उत्तरप्रदेश की राजनीति का एक बड़ा नाम बेहद शांत और गुमनामी में नजर आ रहा है।

हम बात कर रहे है, उत्तर प्रदेश में दलितों के बीच बेहद लोकप्रिय चेहरा यानी की बसपा प्रमुख और एक समय में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती की।

 Mayawati

उत्तर प्रदेश 2022 विधानसभा चुनाव सामने है, और सभी राजनीतिक पार्टियो ने सियासी दाव-पेच खेलना शुरु कर दिया है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से मायावती चर्चा में बिल्कुल नहीं दिखी हैं. बीते दो महीनों से कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर का असर पूरे देश में दिखा, साथ ही उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे शवों को दफ़नाए जाने और इसके बाद उन शवों के ऊपर चढ़े कपड़े निकालने का मुद्दा गर्माया रहा. लेकिन मायावती का राजनीतिक रवैया सिर्फ़ औपचारिक बयानबाज़ी तक ही सीमित रहा.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावो के मद्देनजर समाजवादी पार्टी और काँग्रेस दोनों ने मीडिया में आ रही ख़बरों के सहारे योगी सरकार पर तीखा प्रहार करने की कोशिश की लेकिन मायावती महज़ महामारी से निपटने और उससे जुड़े मुद्दों पर नसीहतें देती नज़र आईं और दबाव की राजनीति से दूर रहीं.

एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, मायावती को मालूम है की सरकार प्रतिशोध की भावना से काम करती है तो इसलिए वो सरकार से किसी भी मुद्दे पर सीधे मुक़ाबले से बचती हैं. जनता को मोबिलाइज़ इन्हें सिर्फ़ इलेक्शन के लिए करना आता है. और बसपा की राजनीति सिर्फ़ उनके वोट बैंक तक सीमित है.”

उन्होने विपक्षी दलों की तुलना करते हुए कहा कि, “काँग्रेस मुद्दे उठा रही है लेकिन उसकी ग्राउंड प्रजेंस नहीं हैं. ट्विटर हमलों की बात करें तो अखिलेश और काँग्रेस काफ़ी सक्रिय थे. लेकिन मायावती शायद यह सोचती हैं कि मेरा वोट बैंक मेरे साथ है.”

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इन सबके बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव को लेकर बीजेपी की स्थिति पर एक हाईप्रोफाइल बैठक भी की जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री शामिल नहीं थे. ऐसे में आने दिनों में उत्तर प्रदेश राजनीतिक तौर पर बेहद अहम होने वाला है.

वैसे कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की स्थिति गंभीर से होने से पहले तक देश की राजनीति में कृषि क़ानूनों का मुद्दा गर्माया हुआ था. कई राज्यों के किसान और विपक्षी राजनीतिक दल कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं उत्तर प्रदेश के अलग हिस्सों के किसान इस आंदोलन में शामिल हैं और काँग्रेस सहित समाजवादी पार्टी भी इस मौके पर भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में दिखाई पड़ रही है लेकिन राज्य की राजनीति में अहम भूमिका रखने वाली बहुजन समाज पार्टी कहीं नज़र नहीं आई.

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यह हाल तब है जब उत्तर प्रदेश के चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बचा है.

14 अप्रैल को भीमराव आंबेडकर जयंती तक लखनऊ और राज्य के दूसरे हिस्सों में कोरोना संक्रमण की तेज़ी के चलते मायावती किसी आयोजन में शरीक़ नहीं हुईं और न ही पार्टी ने कोई बड़ा कार्यक्रम ही आयोजित किया गया लेकिन घर से ही मीडिया को दिए बयान में मायावती ने कहा कि कोरोना संक्रमण के चलते पार्टी सादगी से आंबेडकर जयंती मना रही है.

दरअसल अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मायावती की भूमिका क्या होगी, उनकी पार्टी कितनी सीटें हासिल करेंगी, इन सबको लेकर राजनीतिक गलियारों में कयासों का दौर चलता रहता है लेकिन बहुजन समाज पार्टी की वास्तविक ताक़त का अंदाज़ा लगाने के लिए आगरा से बेहतर कोई दूसरी जगह नहीं हो सकती है.

मोहब्बत की निशानी ताजमहल के अलावा आगरा की एक और पहचान है जिसे ज़्यादा लोग नहीं जानते. आगरा को देश की दलित राजधानी भी कहते हैं क्योंकि यहाँ उत्तर प्रदेश में दलितों की जनसंख्या में जाटव यानी चमड़ा व्यवसाय से जुड़े लोगों का बाहुल्य है.

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छह लाख से ज़्यादा जाटव वोटर आगरा लोकसभा की सात विधानसभा सीटों में हार जीत का फ़ैसला करने का दम रखते हैं. 2007 में जब मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार चुन कर आयी तो आगरा की सातों सीटें बसपा ने जीती थीं.

बसपा की 2007 की ऐतिहासिक जीत के भीतर यह एक और सक्सेस स्टोरी थी. 2007 से 2017 के राजनीतिक सफ़र में बसपा आगरा की इन सात सीटों पर सात से शून्य पर आ गयी. 2007 में 2006 विधान सभा सीटों की ऊंचाई से बसपा दस साल में 2017 में 19 सीटों तक गिर गई. बसपा के गढ़ आगरा में पार्टी का जनाधार भी खिसकता दिख रहा है.

 पैसे देकर टिकट बांटने का आरोप मायावती की पार्टी पर पहले भी लगता रहा है और अब यह चलन दूसरी पार्टियों तक भी पहुँचने लगा है. लेकिन अब तक किसी पार्टी पर लगे ऐसे आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है.

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एक साल पहले ही आगरा में बसपा के ज़िलाध्यक्ष बने 36 साल के विमल वर्मा ने बताया, “मास लीडर हैं बहनजी. पब्लिक बहनजी के साथ है. बसपा कोई धन्ना सेठों की पार्टी नहीं है. पार्टी कैंडिडेट की योग्यता के आधार पर टिकट देती है. इसमें कोई फाइनेंशियल (आर्थिक) क्राइटेरिया है ही नहीं. यह तो इस पार्टी को कमज़ोर करने के लिए लोग इस तरह की बयानबाजी करते हैं, ताकि हमारा वोटर गुमराह हो जाए. लेकिन हमारा वोटर मजबूत है, गुमराह होने वाला नहीं है.”

मायावती पर उनके 2007 से 2012 के शासनकाल में विपक्षी आरोप लगते थे कि वो दलित की बेटी से दौलत की बेटी में तब्दील हो गई हैं. इन आरोपों के बीच मायावती की पार्टी को मैनेज करने वाले तमाम लोग थे लेकिन मुश्किल यह है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में ख़राब नतीजों के बाद, जब पार्टी का क़द कम हुआ तो बसपा बिखरने लगी. कई सारे नेताओ ने पार्टी का साथ छोड़ दिया।

आने वाले समय में ये देखना दिलचस्प होगा की मायावती की पार्टी 2022 विधानसभा चुनाव मे खुद को मजबूती के साथ खड़ा कर पाती है या नही…

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