Manipur Violence : मणिपुर में फिर दहकी हिंसा की आग, रॉकेट हमले के बाद क्यों भड़कीं महिलाएं?

मणिपुर के बिष्णुपुर में एक बार फिर रॉकेट हमले ने शांति की कोशिशों को मटियामेट कर दिया है। ट्रोंगलाओबी में हुए इस हमले में दो मासूम बच्चों की जान चली गई, जिसके बाद पूरे राज्य में तनाव चरम पर है। मेइरा पाइबी महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर सुरक्षा बलों और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। क्या मणिपुर एक और बड़े संघर्ष की ओर बढ़ रहा है?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 24, 2026

Manipur Violence :  मणिपुर में हिंसा और तनाव का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते 7 अप्रैल को हुए एक भीषण रॉकेट हमले ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया, जिसमें दो मासूम बच्चों की जान चली गई। इस घटना के बाद भड़के विरोध-प्रदर्शनों में तीन और लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद से राज्य में उबाल है। अशांति और असुरक्षा के माहौल के बीच 18 अप्रैल से राज्य में ‘पूर्ण बंद’ लागू है। इस बंद के कारण सामान्य जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया है। बाजार, स्कूल और दफ्तर बंद हैं और सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है, लेकिन इस सन्नाटे के बीच न्याय की मांग और सुरक्षा की गुहार तेज होती जा रही है।

मैदान में उतरीं मेइरा पाइबी: दिन में धरना और रात में मशाल गश्त

इस संकटपूर्ण घड़ी में मणिपुर की पारंपरिक शक्ति ‘मेइरा पाइबी’ (मशाल थामने वाली महिलाएं) एक बार फिर सक्रिय हो गई हैं। हजारों की संख्या में ये महिलाएं शांति और व्यवस्था बहाल करने के लिए सड़कों पर उतर आई हैं। मेइरा पाइबी समूह की महिलाएं न केवल विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, बल्कि सामाजिक स्तर पर समुदायों को जोड़ने का काम भी कर रही हैं। दिन के समय ये महिलाएं प्रमुख रास्तों को रोककर धरना दे रही हैं, जिससे पुलिस और सुरक्षा बलों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है। वहीं, सूरज ढलते ही ये महिलाएं हाथों में मशालें लेकर अपने इलाकों की पहरेदारी शुरू कर देती हैं, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।

दोहरी चुनौती: घर की जिम्मेदारी और आंदोलन का कठिन रास्ता

आंदोलन में शामिल महिलाओं के लिए यह रास्ता आसान नहीं है। एक प्रदर्शनकारी महिला ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि उन्हें घर संभालना, रोजी-रोटी का इंतजाम करना और आंदोलन में सक्रिय रहना—इन तीनों मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ रहा है। आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद, वे इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानती हैं। उनके लिए यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को बचाने की लड़ाई है। वे दिन भर के संघर्ष के बाद रात भर जागकर पहरा देती हैं, जो उनके अटूट संकल्प को दर्शाता है।

आर्थिक दबाव और इमा मार्केट की विवशता: संघर्ष के बीच जीविका

लगातार जारी बंद के कारण मणिपुर की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। विशेष रूप से ख्वैरामबंद इमा मार्केट (एशिया का सबसे बड़ा महिलाओं द्वारा संचालित बाजार) की महिला विक्रेताओं पर भारी आर्थिक दबाव है। कुछ महिलाएं मजबूरी में अपनी दुकानें खोलने को विवश हुई हैं। दुकान खोलने वाली अनीता लौरेंबम जैसी महिलाओं का कहना है कि काम करना उनकी मजबूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि वे आंदोलन के खिलाफ हैं। वे अपनी आजीविका चलाने के लिए कुछ घंटे काम करने के बाद फिर से विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो जाती हैं। इसी बीच, नागरिक संगठन ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (COCOMI) ने 25 अप्रैल को एक बड़े आंदोलन की घोषणा कर दी है, जिससे तनाव और बढ़ने की आशंका है।

46 वर्षों का गौरवशाली इतिहास: शराबबंदी से लेकर मानवाधिकारों तक

‘मेइरा पाइबी’ आंदोलन का इतिहास लगभग 46 साल पुराना है। 1980 के दशक में इसकी शुरुआत मणिपुर में व्याप्त शराबखोरी और मादक पदार्थों की समस्या से निपटने के लिए हुई थी। तब भी ये महिलाएं रात में मशाल लेकर गश्त किया करती थीं, जिससे इनका नाम ‘मेइरा पाइबी’ पड़ा। समय के साथ यह आंदोलन मानवाधिकारों के संरक्षण और सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के खिलाफ एक मजबूत आवाज बन गया। इसी आंदोलन से इरोम शर्मिला जैसा विश्वविख्यात चेहरा निकलकर सामने आया, जिन्होंने अपने लंबे उपवास के जरिए पूरी दुनिया का ध्यान मणिपुर की समस्याओं की ओर खींचा था। आज एक बार फिर ये महिलाएं मणिपुर की अखंडता और शांति के लिए ढाल बनकर खड़ी हैं।

Read More  :  WhatsApp ला रहा नया Notification Bubble फीचर, बिना ऐप खोले कर सकेंगे चैट