‘पंचायत’ फेम रघुबीर यादव ने साझा किया जीवन संघर्ष, थिएटर से फिल्मी सफर तक की कहानी

पर्दे पर सच्चाई से किरदार में ढलने वाले कलाकार बहुत गिने-चुने होते हैं. एक्टर रघुबीर यादव उन्हीं में से एक हैं. पॉपुलर सीरीज 'पंचायत' में उनके शानदार और दिल को छू लेने वाले 'प्रधान जी' के किरदार को लोगों ने काफी पसंद किया. उनकी सादगी ने हर किसी का दिल जीत लिया. लेकिन पहचान हासिल करना उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा. इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने काफी मुश्किलों का सामना किया है. एक्टर का छलका दर्द हाल ही में एक्टर ने अपने लंबे और चैलेंजिंग सफर को याद किया. उन्होंने बताया कि एक समय पर वो दिन

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Published On :

जून 13, 2026

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पर्दे पर सच्चाई से किरदार में ढलने वाले कलाकार बहुत गिने-चुने होते हैं. एक्टर रघुबीर यादव उन्हीं में से एक हैं. पॉपुलर सीरीज 'पंचायत' में उनके शानदार और दिल को छू लेने वाले 'प्रधान जी' के किरदार को लोगों ने काफी पसंद किया. उनकी सादगी ने हर किसी का दिल जीत लिया. लेकिन पहचान हासिल करना उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा. इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने काफी मुश्किलों का सामना किया है.

एक्टर का छलका दर्द
हाल ही में एक्टर ने अपने लंबे और चैलेंजिंग सफर को याद किया. उन्होंने बताया कि एक समय पर वो दिन के महज ढाई रुपये पर गुजारा करते थे. कई दफा भूखे सोते थे मीडिया  बातचीत में उन्होंने अपने मुश्किल दिनों पर कहा- एक्टिंग आसान नहीं है, लेकिन इसमें मजा आता है. लोग इसे स्ट्रगल कहते हैं, लेकिन मैंने अपनी जिंदगी को कभी संघर्ष नहीं माना. मैंने कड़ी मेहनत की और इस पूरे प्रोसेस को एन्जॉय किया.

उन्होंने ये भी कहा कई स्टार्स 'संघर्ष' शब्द को अक्सर ग्लोरिफाई करके दिखाते हैं. इसपर उन्होंने अपनी राय देते हुए कहा- हर आर्ट वर्क में प्रैक्टिस की जरूरत होती है. चाहे आप संगीतकार हों, डांसर हों या एक्टर.. आपको सीखते रहना पड़ता है और रिहर्सल करनी पड़ती है. आज भी मुझे लगता है कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है. मेरे लिए, जिंदगी हमेशा एक स्कूल रही है, सीखने की एक जगह.

थिएटर जर्नी की कैसे हुई शुरुआत?
उन्होंने यह भी खुलासा किया कि उनकी एकेडमिक जर्नी ने शुरुआत में ही एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने आगे चलकर उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. एक सिक्योर फ्यूचर की उम्मीद में उन पर साइंस पढ़ने का दबाव था, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हो गया था कि उनके लिए बोर्ड परीक्षाएं पास करना नामुमकिन है. इस एहसास ने उन्हें एक बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया था.

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इस बारे में बात करते हुए वो बोले- मुझे पहले से ही पता था कि मैं फेल होने वाला हूं. परीक्षा के नतीजों से घबराकर मैंने अपने एक दोस्त के साथ घर छोड़ने का फैसला किया और ललितपुर चला गया. वहां एक्टर अन्नू कपूर के पिता की एक थिएटर कंपनी परफॉर्म कर रही थी.

ढाई रुपये पर किया गुजारा
इस तरह थिएटर में उनकी शुरुआत हुई. मदनलाल कपूर की इस कंपनी ने उन्हें ढाई रुपये रोजाना पर रख लिया था. हालांकि, वो मामूली रकम भी हमेशा समय पर या पूरी नहीं मिलती थी. उन्होंने बताया- मुझे रोजाना ढाई रुपये मिलते थे, लेकिन कभी-कभी इससे भी कम मिलते थे. हम आटा और टमाटर खरीद लेते थे, फिर रोटी-चटनी खाकर गुजारा करते थे. जब कोई खाना चुरा लेता था और खाने को कुछ नहीं बचता था, तब हालात और भी ज्यादा मुश्किल हो जाते थे.

20 साल तक गांव से बनाई दूरी
एक्टर ने बताया कि इसी दौरान उन्होंने उर्दू सीखी, अपनी प्रोनन्सिएशन सुधारी और खुद को संगीत और थिएटर में पूरी तरह डुबो दिया. उन्होंने उस दौर के काफी भावुक पल को भी याद किया. उन्होंने बताया कि घर छोड़ने के बाद उन्होंने अपने पिता को लेटर लिखकर भरोसा दिलाया था कि वो कभी भी परिवार का नाम बदनाम नहीं करेंगे. 6 महीने बाद वो कुछ समय के लिए घर लौटे थे, लेकिन एक रिश्तेदार के ताने ने उनकी राह फिर से बदल दी. रिश्तेदार ने उन्हें ताना मारते हुए कहा था- हमें लगा था कि अब तुम सीधे सिनेमा के पर्दे पर ही दिखोगे. ये सुनकर उन्हें इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि वो उसी रात दोबारा घर छोड़कर चले गए. इसके बाद वो करीब 20 साल तक अपने गांव से दूर रहे.