Kolkata Brigade Rally: आगामी चुनावों की सरगर्मी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। दोपहर 12 बजे शुरू हुई इस रैली में करीब एक घंटे तक चले अपने भाषण के दौरान पीएम मोदी ने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने दावा किया कि 2026 के चुनावों में बंगाल की जनता टीएमसी के शासन का अंत कर देगी। हालांकि, प्रधानमंत्री के इस दौरे का उद्देश्य बीजेपी कार्यकर्ताओं में जोश भरना और चुनावी एजेंडा सेट करना था, लेकिन एक उच्चारण संबंधी चूक ने पूरे कार्यक्रम की दिशा बदल दी और विरोधियों को हमला करने का मौका दे दिया।
रानी रासमोनी के नाम पर ‘चूक’: तृणमूल ने बताया बंगाल का अपमान
विवाद की शुरुआत तब हुई जब प्रधानमंत्री बंगाल की महान हस्तियों का जिक्र कर रहे थे। इसी दौरान लोकमाता रानी रासमोनी का नाम लेते समय उनके उच्चारण में त्रुटि हो गई और उन्होंने उन्हें ‘रासमोनी’ कह दिया। तृणमूल कांग्रेस ने इसे हाथों-हाथ लिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पीएम मोदी के भाषण का वीडियो साझा करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। टीएमसी ने सवाल उठाया कि क्या ‘पब्लिसिटी मिनिस्टर’ जानबूझकर बंगाल की अस्मिता और विद्वानों का अपमान करते हैं? पार्टी ने पोस्ट में लिखा, “विनाश काले विपरीत बुद्धि! बीजेपी बंगाल की भावनाओं पर चोट कर बंगाल जीतने का सपना देख रही है।”
विद्वानों के नामों में बार-बार गलती: बीजेपी के लिए बनी गले की फांस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के केंद्रीय नेताओं के लिए बंगाली नामों का सही उच्चारण एक पुरानी चुनौती रही है। इससे पहले भी कई केंद्रीय मंत्रियों की जुबान फिसली है, जहाँ मातंगिनी हाजरा को ‘मातागिनी’ या बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को ‘बांकीमदा’ जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। तृणमूल का आरोप है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्री बंगाल की संस्कृति को समझे बिना केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए यहाँ आते हैं। दक्षिणेश्वर मंदिर की प्रतिकृति वाले भव्य मंच पर खड़े होकर खुद प्रधानमंत्री द्वारा ऐसी गलती करना, बंगाल बीजेपी के स्थानीय नेताओं के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर गया है।
चुनावी मुद्दों से भटका ध्यान: क्या ‘वोकल टॉनिक’ दे पाए प्रधानमंत्री?
इस रैली को लेकर आलोचना इस बात पर भी हो रही है कि प्रधानमंत्री ने उन बुनियादी मुद्दों पर कोई ठोस संदेश नहीं दिया जो चुनाव का ‘खेल’ पलट सकते हैं। एक घंटे के लंबे भाषण में पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए कोई नया ‘वोकल टॉनिक’ या चुनावी दिशा दिखाई नहीं दी। विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री का पूरा भाषण बेमतलब रहा क्योंकि वह केवल पुरानी बातों को दोहराते रहे। बंगाल की राजनीतिक उथल-पुथल में ब्रिगेड मैदान की अहमियत सर्वविदित है, लेकिन रणनीतिक स्पष्टता के अभाव और नाम संबंधी विवाद ने बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेरने का काम किया है।
बंगाल की भावनाओं का मुद्दा: 2026 की राह में भाषाई बाधा
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी हमेशा से खुद को ‘बंगाल की बेटी’ और बीजेपी को ‘बाहरी’ बताकर प्रचार करती रही है। प्रधानमंत्री मोदी की इस ताजा चूक ने टीएमसी के इसी नैरेटिव को और मजबूत कर दिया है। जानकारों का कहना है कि बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में जहाँ महापुरुषों और विद्वानों के प्रति अगाध श्रद्धा है, वहां नामों के उच्चारण में छोटी सी गलती भी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है। अब देखना यह होगा कि बीजेपी इस डैमेज कंट्रोल को कैसे संभालती है और क्या 2026 के चुनावों से पहले वह बंगाली अस्मिता के इस मोर्चे पर अपनी छवि सुधार पाएगी।
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