Mohan Bhagwat: ‘हम सरकार नहीं चलाते’, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राजनीति और अंग्रेजी पर दी दो टूक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 साल पूरे होने पर मुंबई में आयोजित 'न्यू होराइजन्स' कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन की भविष्य की दिशा स्पष्ट की। उन्होंने जातिगत बंधनों को नकारते हुए बताया कि संघ प्रमुख बनने की एकमात्र अनिवार्य शर्त 'हिंदू' होना है। इसके अलावा उन्होंने राजनीति से दूरी, हिंदी का महत्व और सामाजिक समरसता पर कड़ा संदेश दिया।

Mohan Bhagwat

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

फ़रवरी 8, 2026

Mohan Bhagwat: मुंबई के कार्यक्रम में मोहन भागवत ने संघ के नेतृत्व को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ का प्रमुख बनने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय या किसी विशेष जाति का होना जरूरी नहीं है। संघ में जातिगत पहचान का कोई स्थान नहीं है और सभी स्वयंसेवक समान हैं। हालांकि, उन्होंने एक अनिवार्य शर्त का उल्लेख करते हुए कहा कि जो भी व्यक्ति संघ प्रमुख बनेगा, उसका ‘हिंदू’ होना अनिवार्य है। यह बयान संगठन की वैचारिक स्पष्टता को दर्शाता है।

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भाषा के विवाद पर अपना रुख किया स्पष्ट

भाषा के विवाद पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संघ का अंग्रेजी से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि जहाँ अंग्रेजी के बिना काम संभव नहीं है, वहाँ इसका उपयोग किया जाता है, लेकिन अंग्रेजी कभी भी संघ का अभिन्न हिस्सा नहीं होगी क्योंकि यह एक भारतीय भाषा नहीं है। RSS का मुख्य जोर हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं के संवर्धन पर है। उन्होंने स्वयंसेवकों से अपनी मातृभाषा का अधिक से अधिक प्रयोग करने का आह्वान किया।

राजनीति और सरकार से संघ की दूरी

अक्सर RSS और भाजपा के संबंधों को लेकर उठने वाले सवालों पर भागवत ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने साफ किया कि संघ सरकार नहीं चलाता और RSS व BJP दोनों अलग-अलग संस्थाएं हैं। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से कहीं भी सक्रिय हो सकते हैं, लेकिन संगठन का राजनीति से कोई सीधा वास्ता नहीं है। संघ का एकमात्र लक्ष्य समाज को एकजुट करना है और उन्होंने इसे ‘केवल समाज सेवा’ तक ही सीमित रखने का संकल्प दोहराया।

जातिवाद के ठप्पे से बाहर निकलता संगठन

संघ के शुरुआती दिनों का जिक्र करते हुए भागवत ने स्वीकार किया कि पहले एक ही बस्ती से काम शुरू होने और पदाधिकारियों के ब्राह्मण होने के कारण इसे ‘ब्राह्मणों का संघ’ कहा जाता था। लेकिन आज संघ का विस्तार भौगोलिक आधार पर हो रहा है, न कि जाति या वर्ग के आधार पर। उन्होंने बताया कि संघ में नियुक्तियाँ किसी निश्चित पद्धति से नहीं, बल्कि व्यक्ति की योग्यता और समय की आवश्यकता (दायित्व आधारित) के अनुसार की जाती हैं।

सामाजिक समरसता और भाषाई भेदभाव मिटाने का मंत्र

मोहन भागवत ने समाज में भाषा के आधार पर होने वाले भेदभाव को एक स्थानीय समस्या बताया और इसे फैलने से रोकने की चेतावनी दी। उन्होंने समाधान सुझाते हुए कहा कि लोगों को एक-दूसरे के घर जाना चाहिए, सुख-दुःख साझा करना चाहिए और विभिन्न भाषा-भाषी लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने के तरीके ढूंढने और समाज की ‘मरम्मत’ कर उसे जोड़ने पर बल दिया।

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