Sabarimala Temple : सबरीमाला पर केंद्र की दलील, पुरुषों के ब्यूटी पार्लर जाने का जिक्र कर सबको चौंकाया

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने नया मोड़ ले लिया है। केंद्र सरकार ने परंपराओं का हवाला देते हुए पुरुषों के 'ब्यूटी पार्लर' जाने और मंदिर की पवित्रता के बीच एक चौंकाने वाला तर्क पेश किया है। क्या यह दलील महिलाओं के प्रवेश की राह रोकेगी?

Sabarimala Temple

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अप्रैल 10, 2026

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Sabarimala Temple :  केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही कानूनी बहस में एक नया मोड़ आया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें पेश करते हुए मंदिर की परंपराओं का पुरजोर समर्थन किया है। सरकार का तर्क है कि भारत विविधताओं और विविध मान्यताओं का देश है, जहाँ अलग-अलग मंदिरों की अपनी विशेष प्रथाएँ हैं। केंद्र ने अदालत को बताया कि केवल महिलाओं के प्रवेश पर ही नहीं, बल्कि देश के कई मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर भी कड़ी पाबंदियां लागू हैं।

नौ जजों की बेंच के सामने सॉलिसिटर जनरल की दलीलें

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संवैधानिक पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने केंद्र का पक्ष रखा। उन्होंने हलफनामे के माध्यम से स्पष्ट किया कि किसी विशेष वर्ग को मंदिर में प्रवेश से रोकना भेदभाव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था का हिस्सा है। उन्होंने तर्क दिया कि सबरीमाला में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को किसी वर्ग को कम आंकने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी ही पाबंदियां पुरुषों पर भी कई अन्य पवित्र स्थानों पर लागू हैं।

पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर: जहां विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है

एसजी तुषार मेहता ने राजस्थान के पुष्कर स्थित भगवान ब्रह्मा के इकलौते मंदिर का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि इस मंदिर की मान्यता के अनुसार, यहाँ विवाहित पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं है। यह प्रथा भगवान ब्रह्मा को मिले एक पौराणिक श्राप और धार्मिक शुचिता से जुड़ी है। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि हिंदू धर्म में लिंग आधारित नहीं, बल्कि अनुष्ठान आधारित नियम भी प्रचलित हैं।

कोत्तांकुलंगारा मंदिर: जहां पुरुष बनते हैं ‘नारी’

आस्था के एक अनोखे रूप का जिक्र करते हुए केंद्र ने केरल के कोत्तांकुलंगारा श्री देवी मंदिर का विवरण दिया। यहाँ की प्रथा बेहद दिलचस्प है—इस मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुष भक्तों को महिलाओं की तरह सोलह शृंगार करना होता है। तुषार मेहता ने बताया कि पुरुष यहाँ आने से पहले ब्यूटी पार्लर जाते हैं, साड़ी पहनते हैं और गहने धारण करते हैं। यहाँ तक कि पुरुष भक्त दाढ़ी शेव कर पूरी तरह महिला रूप धारण कर देवी का आशीर्वाद लेते हैं। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भक्त अपनी आस्था के लिए किसी भी प्रथा का पालन सहर्ष करते हैं।

कन्याकुमारी और मुजफ्फरपुर: जहां पुरुषों की एंट्री है प्रतिबंधित

सॉलिसिटर जनरल ने कन्याकुमारी के भगवती अम्मन मंदिर और मुजफ्फरपुर के माता मंदिर का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि भगवती माता मंदिर में पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहाँ तक कि केरल के चक्कुलथुकावू मंदिर में ‘नारी पूजा’ के दौरान केवल महिलाओं को ही मंदिर परिसर में रहने की अनुमति होती है और पुरुष पुजारी स्वयं उनके पैर धोते हैं। इसी तरह, अत्तुकल मंदिर में पोंगल के त्योहार पर केवल महिला भक्तों का विशाल जमावड़ा लगता है, जिसे ‘महिलाओं का सबरीमाला’ भी कहा जाता है।

2018 के फैसले पर ऐतराज और पुनर्विचार की मांग

केंद्र सरकार ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर असहमति जताई, जिसमें हर उम्र की महिलाओं को सबरीमाला जाने की इजाजत दी गई थी। तुषार मेहता ने कहा कि हिंदू धर्म अकेला ऐसा धर्म है जहाँ मातृ शक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और पुरुष भक्त देवियों के पैर छूते हैं। उन्होंने कहा कि आस्था के मामलों में तार्किकता से अधिक परंपराओं का महत्व होता है। बता दें कि 2019 में पांच जजों की बेंच ने इस मुद्दे को 3:2 के बहुमत से एक बड़ी बेंच (नौ जजों की पीठ) के पास विस्तृत विचार के लिए भेज दिया था।

आस्था बनाम संवैधानिक अधिकार

केंद्र की इन दलीलों ने एक बार फिर संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक मान्यताओं के बीच के संतुलन पर बहस छेड़ दी है। सरकार का रुख साफ है कि सबरीमाला की परंपरा को अन्य मंदिरों की प्रथाओं के समान ही सम्मान मिलना चाहिए। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि क्या सदियों पुरानी परंपराओं को आधुनिक समानता के चश्मे से बदलना सही होगा या नहीं।

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