Sabarimala Temple Case: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं की संवैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। नौ जजों की संविधान पीठ ने इस दौरान धर्म, आस्था और सामाजिक सुधारों के बीच संतुलन को लेकर बेहद गंभीर और सख्त टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुधारों की आड़ में किसी भी धर्म की अनिवार्य मान्यताओं और उसकी पहचान को समाप्त नहीं किया जा सकता।
आस्था और कानून के बीच संतुलन की चुनौती
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्वीकार किया कि लाखों लोगों की गहरी आस्था और मान्यताओं को न्यायिक तराजू पर तौलना और उन्हें ‘गलत’ या ‘भ्रामक’ ठहराना अदालत के लिए सबसे कठिन कार्यों में से एक है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से किसी धर्म की आंतरिक व्यवस्था में तब तक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, जब तक याचिकाकर्ता का उसमें सीधा हित न हो। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम सामाजिक भलाई या सुधार के नाम पर किसी धर्म को भीतर से खोखला नहीं कर सकते।” अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या उन लाखों भक्तों का पक्ष सुने बिना कोई फैसला सुनाना उचित होगा, जिनकी भावनाएं इस मंदिर से जुड़ी हैं।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सरकारी हस्तक्षेप (अनुच्छेद 25 और 26)
त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के बीच के बारीक अंतर को समझाया। उन्होंने दलील दी कि जहाँ अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता देता है, वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने प्रबंधन का अधिकार देता है।
मूल पहचान का संरक्षण: सिंघवी ने तर्क दिया कि सरकार को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने का अधिकार (अनुच्छेद 25(2)(b)) जरूर है, लेकिन यह अधिकार इतना व्यापक नहीं होना चाहिए कि धर्म की मूल पहचान ही मिट जाए।
‘अनिवार्य प्रथा’ का विवाद: उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि वह यह तय करना बंद करे कि किसी धर्म के लिए कौन सी प्रथा ‘अनिवार्य’ (Essential) है और कौन सी नहीं। सिंघवी के अनुसार, यह न्यायाधीशों का काम नहीं है कि वे किसी समुदाय के धर्म के मूल तत्वों का मूल्यांकन बाहरी न्यायिक मानकों से करें।
2018 का फैसला और वर्तमान स्थिति
उल्लेखनीय है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। उस समय अदालत ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं पर लगी पाबंदी को ‘छुआछूत’ और ‘पितृसत्तात्मक सोच’ का हिस्सा बताया था। हालांकि, भगवान अयप्पा के भक्तों का तर्क है कि मंदिर की यह परंपरा उनके ‘ब्रह्मचारी’ स्वरूप के सम्मान में है, न कि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान विधायी सुधारों की सीमा पर सवाल उठाए। सिंघवी ने जवाब दिया कि सुधार केवल सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए होने चाहिए, न कि धर्म के अनुष्ठानों को बदलने के लिए।
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