Rupee vs Dollar : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की सदस्य शमिका रवि इन दिनों अपने एक बयान को लेकर काफी चर्चा में हैं। उन्होंने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होकर 100 के स्तर तक पहुंचने की चिंताओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है। समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) के एक पॉडकास्ट में बातचीत करते हुए शमिका रवि ने स्पष्ट रूप से कहा कि “तो क्या? 100 तो महज एक संख्या है।” उनका मानना है कि सरकार का मुख्य ध्यान किसी विशेष एक्सचेंज रेट को जबरन बचाने पर नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई शॉक से पैदा होने वाले बड़े आर्थिक प्रभावों को सही तरीके से प्रबंधित करने पर होना चाहिए।
बाजार में अनावश्यक दखल और महंगाई के खतरों से बचने की सलाह
शमिका रवि ने विनिमय दर को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार को किसी निश्चित स्तर पर रुपये की वैल्यू को बनाए रखने के लिए बाजार में कूदने से बचना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है, तो इससे देश में महंगाई का दबाव काफी बढ़ जाएगा, जिसके अर्थव्यवस्था पर कई अन्य प्रतिकूल और अजीब प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जो बाजार वर्तमान में सुचारू रूप से कार्य कर रहा है, उसमें किसी भी तरह का कृत्रिम दखल नहीं देना चाहिए। यह दृष्टिकोण पूरी तरह से सरकार के राजकोषीय अनुशासन (फिस्कल डिसिप्लिन) और देश में गैर-जरूरी खपत को रोकने की नीति के अनुकूल है।
अनावश्यक खपत पर नियंत्रण और सप्लाई शॉक से निपटने की रणनीति
आर्थिक सलाहकार ने देश में बचत और संसाधनों के सही उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि यही कारण है कि प्रधानमंत्री और सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा लगातार बचत के उपाय अपनाने तथा अन्य जरूरी सलाह दी जा रही हैं, क्योंकि हम अर्थव्यवस्था में बेकार की खपत को बढ़ावा नहीं देना चाहते। उन्होंने स्वीकार किया कि जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों के बीच स्थिर होगी, कीमतों में कुछ बढ़ोतरी होने की संभावना बनी रहेगी। सप्लाई साइड (आपूर्ति पक्ष) में आने वाली रुकावटों के जवाब में केवल डिमांड (मांग) को मैनेज करना एक सीमित जरिया है। कीमतें बढ़ना मांग को नियंत्रित करने का एक स्वाभाविक तरीका है, क्योंकि इस वैश्विक सप्लाई शॉक के बीच आपके पास करने को बहुत कुछ नहीं होता।
विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति और द्विपक्षीय समझौतों का महत्व
जब शमिका रवि से यह सवाल पूछा गया कि भारत कब तक अपने विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व) पर निर्भर रह सकता है, तो उन्होंने बेहद आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, “जब तक इसकी आवश्यकता होगी।” इसके साथ ही उन्होंने भरोसा जताया कि भारत द्वारा किए जा रहे नए अंतर्राष्ट्रीय समझौते समय के साथ इस विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से मजबूत करने में मदद करेंगे। उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ भारत के हालिया आर्थिक समझौते का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम बताया। उनके अनुसार, यह समझौता भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के साथ-साथ हमारी बाहरी आर्थिक स्थिरता को भी काफी मजबूती प्रदान करेगा।
वैश्विक झटकों के बीच घरेलू मांग से संचालित भारतीय अर्थव्यवस्था
शमिका रवि ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत विकास दर (हाई-ग्रोथ फेज) की राह पर आगे बढ़ रही है। पिछले एक दशक में दुनिया भर में आए बड़े आर्थिक झटकों के बावजूद भारतीय बाजार ने अपनी आंतरिक मजबूती का बेहतरीन प्रदर्शन किया है। उन्होंने इस स्थिरता का पूरा श्रेय भारत के विशिष्ट विकास मॉडल को दिया, जो मुख्य रूप से घरेलू मांग और आंतरिक खपत पर आधारित है। यही कारण है कि दुनिया भर में होने वाली आर्थिक उथल-पुथल का भारत पर बहुत बुरा असर नहीं पड़ता है।
निर्यात आधारित देशों की तुलना में भारत के विकास मॉडल की मजबूती
दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान और चीन जैसे देशों का आर्थिक ढांचा मुख्य रूप से निर्यात (एक्सपोर्ट) पर टिका हुआ है, जिसके विपरीत भारत की आर्थिक प्रगति काफी हद तक घरेलू खपत और मांग के दम पर चलती है। शमिका रवि के अनुसार, इसी मजबूत घरेलू ढांचे ने भारत को अपने समकालीन देशों की तुलना में बाहरी आर्थिक झटकों से अधिक सुरक्षित रखा है। पिछले दस वर्षों में वैश्विक स्तर पर जितने भी बड़े आर्थिक झटके लगे हैं, वे हमारी मजबूत डोमेस्टिक डिमांड के कारण भारत के लिए कभी बड़ा संकट नहीं बन पाए। इसके साथ ही सरकार के बेहतरीन राजकोषीय प्रबंधन और अनुशासन ने शॉर्ट-टर्म फायदों के बजाय लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी को चुनकर देश की आर्थिक स्थिरता को बनाए रखा है।
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