Engineering से लेकर राजनीति तक Arvind Kejriwal के संघर्ष की कहानी

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Arvind Kejriwal तात्कालिक भारतीय राजनीति में वह नाम हैं, जो अक्सर किसी न किसी विवाद में उलझे रहते हैं। अन्ना जन लोकपालबिल आंदोलन से भारतीय राजनीति की सक्रिय जमीन पर कदम रखने वाले अरविंद केजरीवाल ने एक समय में अपनी तीव्र राजनैतिक सक्रियता से पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ़ खींच लिया था.

Arvind Kejriwal

इन्होंने अन्ना आंदोलन के बाद अपनी राजनैतिक पार्टी बनाई, जिसका नाम है ‘आम आदमी पार्टी’. आम आदमी पार्टी ने पहली बार दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ी और एक बेहतर परिणाम के साथ सामने आई. इसे 70 में कुल 28 सीटें प्राप्त हुई थीं.

लगभग डेढ़ महीने कांग्रेस के बाहरी समर्थन में सरकार चलाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफे के बाद लगभग एक वर्ष तक दिल्ली में एलजी का शासन रहा.

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दूसरी बार जब चुनाव हुए, तो यह परिणाम और भी बेहतर हो गया. इस पार्टी को 70 में से कुल 67  सीटें प्राप्त हुईं, ये एक ऐतिहासिक जीत थी. राजनीति से पहले ये आईआरएस अफसर थे.

अरविंद केजरीवाल एक भारतीय राजनीतिज्ञ, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। अपने पहले कार्यकाल के दौरान वह २८ दिसम्बर २०१३ से १४ फ़रवरी २०१४ तक इस पद पर रहे।

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इससे पहले वो एक सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं और सरकारी कामकाज़ में अधिक पारदर्शिता लाने के लिये संघर्ष किया। भारत में सूचना अधिकार अर्थात सूचना कानून के आन्दोलन को जमीनी स्तर पर सक्रिय बनाने.

सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और सबसे गरीब नागरिकों को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये सशक्त बनाने हेतु उन्हें वर्ष 2006 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने आम आदमी पार्टी के नाम से एक नये राजनीतिक दल की स्थापना की।

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अरविंद केजरीवाल का जन्म 1968 में हरियाणा के हिसार शहर में हुआ और उन्होंने १९८९ में आईआईटी खड़गपुर से यांत्रिक अभियांत्रिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

बाद में, १९९२ में वे भारतीय नागरिक सेवा के एक भाग, भारतीय राजस्व सेवा में आ गए और उन्हें दिल्ली में आयकर आयुक्त कार्यालय में नियुक्त किया गया। शीघ्र ही, उन्होंने महसूस किया कि सरकार में बहुप्रचलित भ्रष्टाचार के कारण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है।

अपनी अधिकारिक स्थिति पर रहते हुए ही उन्होंने, भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम शुरू कर दी। प्रारंभ में, अरविंद ने आयकर कार्यालय में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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जनवरी २००० में, उन्होंने काम से विश्राम ले लिया और दिल्ली आधारित एक नागरिक आन्दोलन-परिवर्तन की स्थापना की, जो एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए काम करता है।

इसके बाद, फरवरी २००६ में, उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और पूरे समय के लिए सिर्फ ‘परिवर्तन’ में ही काम करने लगे।[8] अरुणा रॉय, गोरे लाल मनीषी [9] और कई अन्य लोगों के साथ मिलकर, उन्होंने सूचना अधिकार अधिनियम के लिए अभियान शुरू किया.

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जो जल्दी ही एक मूक सामाजिक आन्दोलन बन गया, दिल्ली में सूचना अधिकार अधिनियम को 2001 में पारित किया गया और अंत में राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संसद ने 2005 में सूचना अधिकार अधिनियम को पारित कर दिया।

इसके बाद, जुलाई २००६ में, उन्होंने पूरे भारत में आरटीआई के बारे में जागरूकता फ़ैलाने के लिए एक अभियान शुरू किया।दूसरों को प्रेरित करने के लिए अरविन्द ने अब अपने संस्थान के माध्यम से एक आरटीआई पुरस्कार की शुरुआत की है।

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सूचना का अधिकार गरीब लोगों के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही आम जनता और पेशेवर लोगों के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है।

आज भी कई भारतीय सरकार के निर्वाचन की प्रक्रिया में निष्क्रिय दर्शक ही बने हुए हैं। अरविंद सूचना के अधिकार के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को अपनी सरकार से प्रश्न पूछने की शक्ति देते हैं।

अपने संगठन परिवर्तन के माध्यम से वे लोगों को प्रशासन में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते हैं। आरटीआई को आम नागरिक के लिए एक शक्तिशाली उपकरण बनने में लम्बा समय लगेगा। हालांकि अरविन्द ने हमें दिखा दिया है कि वास्तव में इसके लिए एक सम्भव रास्ता है।

६ फ़रवरी २००७ को, अरविन्द को वर्ष 2006 के लिए लोक सेवा में सीएनएन आईबीएन ‘इस वर्ष का भारतीय’ के लिए नामित किया गया। अरविंद ने सूचना अधिकार अधिनियम को स्पष्ट करते हुए गूगल पर भाषण दिया। “

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२८ दिसम्बर २०१३ से १४ फ़रवरी २०१४ तक ४९ दिन दिल्ली के मुख्यमन्त्री के रूप में कार्य करते हुए अरविन्द लगातार सुर्खियों में बने रहे। नवभारत टाइम्स ने लिखा – “केजरी सरकार: ऐक्शन, ड्रामा, इमोशन, सस्पेंस का कंप्लीट पैकेज।”

मुख्यमन्त्री बनते ही पहले तो उन्होंने सिक्योरिटी वापस लौटायी। फिर बिजली की दरों में 50% की कटौती की घोषणा कर दी। दिल्ली पुलिस व केन्द्रीय गृह मन्त्रालय के खिलाफ उन्होंने धरना भी दिया।

इसके बाद रिटेल सैक्टर में एफडीआई को खारिज किया और सबसे बाद जाते-जाते फरवरी २०१४ में उन्होंने भूतपूर्व व वर्तमान केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री मडल देवड़ा व वीरप्पा मोईली तथा भारत के सबे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी व उनकी कम्पनी रिलायंस के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कराने के आदेश जारी कर दिये।

लोकपाल बिल भी एक प्रमुख मुद्दा रहा जिस पर उनका दिल्ली के लेफ्टिनेण्ट गवर्नर, विपक्षी दल भाजपा और यहाँ तक कि समर्थक दल काँग्रेस से भी गतिरोध बना रहा। लोकपाल मुद्दे पर हुए आंदोलन से ही अरविन्द पहली बार देश में जाने गये थे।

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वे इसे कानूनी रूप देने के लिये प्रतिबद्ध थे। परन्तु विपक्षी दल कोंग्रेस एवं भाजपा बिल ने बिल को असंवैधानिक बताकर विधानसभा में बिल पेश करने का लगातार विरोध किया। विरोध के चलते १४ फ़रवरी को दिल्ली विधान सभा में यह बिल रखा ही न जा सका।

विधान सभा में कांग्रेस और बीजेपी के लोकपाल बिल के विरोध में एक हो जाने पर और भ्रष्ट नेताओ पर लगाम कसने वाले इस लोकपाल बिल के गिर जाने के बाद उन्होंने नैतिक आधार पर मुख्यमन्त्री पद से इस्तीफा दे दिया।

उनका सामाजिक जीवन तब उभरा जब उन्होंने 1999 में नकली राशन कार्ड घोटाले को उजागर करने के लिए ‘परिवर्तन’ नामक एक आंदोलन की स्थापना की और आयकर, बिजली और खाद्य राशन से जुड़े मामलों में दिल्ली के नागरिकों की सहायता की।

सामाजिक कारणों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और 2006 में पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की।

केजरीवाल की लोकप्रियता 2010 में बढ़ गई जब उन्होंने 2010 के शुरू में जन लोकपाल बिल को पारित करने के लिए प्रचार करते हुए प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के साथ खुद को जोड़ा।

अन्ना हजारे के साथ उनके मतभेद लोकप्रिय हुआ कि भारत के खिलाफ भ्रष्टाचार आंदोलन का राजनीतिकरण करना है या नहीं।

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