Supreme Court Decision: SC सख्त, सुरक्षित फैसलों में देरी पर सभी हाईकोर्ट को 3 महीने में निर्णय का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित मामलों (Reserved Judgments) में फैसला सुनाने में होने वाली लेटी-लतीफी पर कड़ा रुख अपनाते हुए देश के सभी हाईकोर्ट्स के लिए नई और बाध्यकारी गाइडलाइन जारी की है।

Supreme Court Decision

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

मई 29, 2026

Supreme Court Decision: देश की न्याय प्रणाली में लंबित मामलों और सुरक्षित फैसलों (Reserved Judgments) को सुनाने में होने वाली अत्यधिक देरी पर सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस ढुलमुल व्यवस्था को सुधारने के लिए देश के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) के लिए विस्तृत, स्पष्ट और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने दोटूक कहा है कि जब किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया जाता है, तो उसे हर हाल में अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों, जैसे नियमित जमानत (Regular Bail) और अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिकाओं के निपटारे में न्यायपालिका को अत्यधिक तत्परता और संवेदनशीलता दिखानी होगी।

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क्या है पूरा मामला? क्यों सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा?

सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक और कड़ा फैसला झारखंड हाईकोर्ट में लंबे समय से लंबित कुछ आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान आया। मामले के याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह दर्दनाक सच्चाई रखी कि उच्च न्यायालय में उनकी अपीलों पर अंतिम बहस और सुनवाई पूरी होने के बावजूद, दो से तीन साल की लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी फैसला नहीं सुनाया गया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बिना किसी निर्णय के उन्हें सालों तक अनिश्चितता और जेल में रखना उनके जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन है। इस पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है’ और इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की 10 बड़ी बातें

अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए 10 सूत्रीय गाइडलाइन जारी की है—

किसी भी आरक्षित मामले में तार्किक और कारण सहित फैसला (Reasoned Judgment) अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाने का प्रयास किया जाए।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जमानत से जुड़े मामलों को कोर्ट की दैनिक कार्यसूची में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

जमानत याचिकाओं पर फैसला या तो उसी दिन सुनाया जाए, या फिर अधिकतम अगले दिन सुनाना और अपलोड करना अनिवार्य होगा।

जमानत मिलने की स्थिति में कोर्ट का आदेश तुरंत ई-मोड से जेल प्रशासन को भेजा जाए, ताकि कागजी कार्रवाई के कारण रिहाई में देरी न हो।

खुली अदालत (Open Court) में सुनाए गए किसी भी फैसले को अगले 24 घंटे के भीतर हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करना होगा।

यदि अदालत ने केवल ‘ऑपरेटिव पार्ट’ (मुख्य निष्कर्ष) सुनाया है, तो उसका विस्तृत फैसला (Detailed Judgment) 15 दिनों के भीतर हर हाल में अपलोड करना होगा।

यदि सुरक्षित रखा गया फैसला तीन महीने तक नहीं आता है, तो रजिस्ट्री द्वारा यह मामला संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के संज्ञान में लाया जाएगा।

यदि फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद 3 महीने और अतिरिक्त 1 महीना (कुल 4 महीने) बीत जाते हैं, तो मामले से जुड़े पक्षकार केस को दूसरी बेंच को सौंपने (Re-hearing) की मांग कर सकेंगे।

सभी उच्च न्यायालयों को अपनी वेबसाइट पर आरक्षित फैसलों की सूची, उनकी तारीखें और वर्तमान स्थिति को सार्वजनिक (Public View) करना होगा।

जैसे ही कोई फैसला वेबसाइट पर अपलोड होगा, संबंधित वकीलों और पक्षकारों को उनके पंजीकृत ई-मेल के माध्यम से तुरंत ऑटो-जेनरेटेड सूचना भेजी जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का अपना अनुभव

इन दिशा-निर्देशों को जारी करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि इन कड़े नियमों का उद्देश्य किसी न्यायाधीश, वकील या अदालत की कार्यप्रणाली की आलोचना करना नहीं है, बल्कि व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है।

उन्होंने अपने लंबे न्यायिक करियर का उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनके करीब 15 वर्षों के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने प्रशासनिक स्तर पर कभी ऐसा नहीं होने दिया कि कोई फैसला सुरक्षित रखने के बाद तीन महीने से अधिक समय तक धूल फांकता रहे। उन्होंने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे अपनी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और नियमों में तुरंत आवश्यक संशोधन करें ताकि इन नियमों को जमीनी स्तर पर लागू किया जा सके।

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