Netaji Subhash Chandra Bose: देश के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु और उनकी अस्थियों को लेकर चल रहा दशकों पुराना विवाद एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुँचा। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने जापान के टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर से नेताजी की कथित अस्थियां भारत वापस लाने की मांग करने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत के कड़े रुख के बाद याचिकाकर्ता को अपनी अर्जी वापस लेनी पड़ी।
न्यायालय का हस्तक्षेप से इनकार और याचिका की वापसी
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की विशेष पीठ ने की। याचिकाकर्ता आशीष रे, जो नेताजी की बहन के पोते हैं, की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने पुरजोर तरीके से पक्ष रखा। हालांकि, पीठ ने मामले की गंभीरता और इसकी प्रकृति को देखते हुए इस पर किसी भी प्रकार के आदेश पारित करने में अपनी अनिच्छा जताई। कोर्ट के रुख को भांपते हुए अधिवक्ता सिंघवी ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने तत्काल स्वीकार कर लिया।
अस्थियों की प्रमाणिकता पर शीर्ष अदालत के तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ऐतिहासिक तथ्यों और दावों की सत्यता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जिन अस्थियों को जापान के मंदिर से लाने की मांग की जा रही है, इस बात के पुख्ता वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण क्या हैं कि वे वास्तव में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ही हैं? पीठ ने स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस आधार और अकाट्य साक्ष्यों के न्यायालय इस तरह के संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दों पर कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं कर सकता।
बार-बार याचिका लाने पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि नेताजी से जुड़े मुद्दे समय-समय पर न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते रहे हैं। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि यह विषय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बार-बार लाया जा रहा है, जबकि पिछले साल भी इसी तरह की एक याचिका को खारिज किया जा चुका था। न्यायालय ने कहा कि बार-बार एक ही मांग को अलग-अलग याचिकाओं के माध्यम से उठाना न्यायिक समय का उचित उपयोग नहीं है, खासकर तब जब मामला ऐतिहासिक रहस्यों और विवादों से घिरा हो।
पारिवारिक मतभेद और उत्तराधिकार का पेचीदा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु की ओर इशारा किया कि नेताजी के परिवार के भीतर भी इन अस्थियों और उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर गहरे मतभेद हैं। अदालत ने कहा कि जब परिवार के सदस्य ही एकमत नहीं हैं, तो न्यायपालिका के लिए हस्तक्षेप करना और भी कठिन हो जाता है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि नेताजी की 84 वर्षीय बेटी उनकी एकमात्र जीवित वारिस हैं और वे अस्थियां वापस चाहती हैं। इस पर पीठ ने दोटूक शब्दों में कहा कि यदि यह मांग उनकी है, तो उन्हें स्वयं न्यायालय के समक्ष आकर अपनी बात रखनी चाहिए।
नेताजी का सम्मान सर्वोपरि: न्यायालय की भावुक अभिव्यक्ति
हालांकि अदालत ने कानूनी आधार पर याचिका को खारिज किया, लेकिन नेताजी के प्रति सम्मान व्यक्त करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पीठ ने कहा, “नेताजी सुभाष चंद्र बोस देश के महानतम नायकों में से एक हैं और पूरा देश उनके सर्वोच्च बलिदान को नमन करता है।” अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी महानता और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान पर कोई संदेह नहीं है, लेकिन अस्थियों को भारत लाने का मामला कानूनी से अधिक कूटनीतिक और ऐतिहासिक शोध का विषय है, जिसे सरकार के स्तर पर ही सुलझाया जाना चाहिए।
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