UP News: गुमशुदा लोगों के आंकड़ों पर हाई कोर्ट हैरान, PIL दर्ज करने का आदेश

उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 2 वर्षों में 1.08 लाख से अधिक लोग गायब हुए, लेकिन पुलिस ने मात्र 9,700 मामलों में कार्रवाई की। कोर्ट ने इसे "चौंकाने वाला" बताते हुए स्वतः संज्ञान लिया और जनहित याचिका (PIL) दर्ज करने का आदेश दिया है।

UP News

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

फ़रवरी 5, 2026

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UP News: उत्तर प्रदेश में लापता व्यक्तियों की बढ़ती संख्या और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस स्थिति को न केवल चिंताजनक बल्कि “चौंकाने वाला” बताया है। जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया है।

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पुलिस की शिथिलता और लापता नागरिकों की सुरक्षा पर उठे सवाल

बताते चले कि, अदालत ने राज्य में गुमशुदा लोगों की शिकायतों पर पुलिस के “सुस्त रवैये” और उदासीनता पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि गुमशुदगी जैसे संवेदनशील मामलों में तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता होती है, लेकिन आंकड़ों से ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी इस विषय को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि वह अधिकारियों के इस रवैये को देखकर “हैरान” है।

सरकारी हलफनामे में उजागर हुए गुमशुदा व्यक्तियों के भयावह आंकड़े

अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) द्वारा कोर्ट में पेश किए गए शपथ पत्र ने उत्तर प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। हलफनामे के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 के बीच राज्य में कुल 1,08,300 लोग लापता हुए। इन चौंकाने वाले आंकड़ों के बावजूद, पुलिस ने केवल 9,700 मामलों में ही कानूनी कार्रवाई या तलाश शुरू की। इसका अर्थ है कि करीब 90% मामलों में पुलिस ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिसे कोर्ट ने जनहित के खिलाफ माना।

विक्रमा प्रसाद की याचिका और पुलिसिया निष्क्रियता का मामला

यह पूरा प्रकरण विक्रमा प्रसाद नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिट याचिका से शुरू हुआ। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनका बेटा जुलाई 2024 से लापता है, लेकिन बार-बार गुहार लगाने के बाद भी पुलिस उसे खोजने में कोई रुचि नहीं दिखा रही है। इसी व्यक्तिगत पीड़ा ने राज्य में चल रही एक बड़ी प्रशासनिक विफलता को उजागर कर दिया, जिसके बाद कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत मामले से ऊपर उठाकर व्यापक जनहित का मुद्दा माना।

इन रे: मिसिंग पर्सन्स इन द स्टेट नाम से जनहित याचिका दर्ज

हाई कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले को “In re: Missing Persons in the State” शीर्षक के तहत एक जनहित याचिका (PIL) के रूप में पंजीकृत किया जाए। अदालत ने माना कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गायब होना और उन पर कार्रवाई न होना सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने इस पर लगातार सुनवाई का निर्णय लिया है।

अगली न्यायिक कार्रवाई और गृह विभाग से जवाबदेही की मांग

अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए आज, गुरुवार (5 फरवरी, 2026) की तारीख तय की है। बेंच ने गृह विभाग से इस पर विस्तृत जवाब मांगा है कि आखिर क्यों इतनी भारी संख्या में शिकायतों के बावजूद पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। कोर्ट अब इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली को सुधारने और लापता लोगों की बरामदगी के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी कर सकती है।

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