West Asia Crisis Meet: सर्वदलीय बैठक में विपक्ष का ‘पावर कट’, TMC का बहिष्कार और राहुल गांधी की गैरमौजूदगी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बुलाई गई इस महत्वपूर्ण बैठक का उद्देश्य युद्ध के कारण बढ़ती तेल की कीमतों और भारतीयों की सुरक्षा पर चर्चा करना था। लेकिन TMC ने इसे 'दिखावा' बताकर बहिष्कार कर दिया, जबकि राहुल गांधी ने केरल में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम का हवाला देते हुए किनारा कर लिया। क्या विपक्ष सरकार की रणनीति से सहमत नहीं है?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मार्च 25, 2026

West Asia Crisis Meet: पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष और उससे उत्पन्न वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण सर्वदलीय बैठक आयोजित की है। बुधवार को नई दिल्ली में शुरू हुई इस उच्च स्तरीय चर्चा का उद्देश्य मिडिल ईस्ट के बिगड़ते हालातों पर राष्ट्रीय सहमति बनाना और विपक्ष के सुझावों को सुनना है। हालांकि, इस महत्वपूर्ण मोड़ पर भी देश की राजनीति बंटी हुई नजर आ रही है, जहां प्रमुख विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में मंथन: अमित शाह और जयशंकर मौजूद

इस सर्वदलीय बैठक की कमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह संभाल रहे हैं। बैठक की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी जैसे दिग्गज शामिल हुए हैं। इसके अलावा बीजेडी, जेडीयू, कांग्रेस और वामपंथी दलों के प्रतिनिधि भी चर्चा का हिस्सा बने। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बैठक में युद्ध के रणनीतिक और कूटनीतिक पहलुओं पर एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया, जिससे नेताओं को जमीनी हकीकत से रूबरू कराया जा सके।

राहुल गांधी की अनुपस्थिति और केंद्र पर तीखा प्रहार

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस बैठक से दूरी बनाए रखी। उन्होंने एक दिन पूर्व ही स्पष्ट कर दिया था कि केरल में पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों के कारण वह शामिल नहीं हो पाएंगे। हालांकि, राहुल गांधी ने विदेश नीति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश नीति अब “यूनिवर्सल मजाक” बन गई है और यह राष्ट्रीय हितों के बजाय सरकार की निजी पसंद-नापसंद से संचालित हो रही है। गांधी ने तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री वही करेंगे जो अमेरिका और इजरायल उन्हें निर्देशित करेंगे।

TMC का सख्त रुख: “BJP के साथ बैठक क्यों करें?”

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस बैठक का पूर्ण बहिष्कार किया है। टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कड़े लहजे में कहा कि उनकी पूरी लड़ाई भाजपा की विचारधारा और कार्यशैली के खिलाफ है, ऐसे में वे उनके साथ किसी भी मेज पर बैठने को तैयार नहीं हैं। टीएमसी का यह रुख दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय भी केंद्र और ममता बनर्जी की पार्टी के बीच की कड़वाहट कम नहीं हुई है। वहीं, एनडीए सहयोगियों ने इस बहिष्कार को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

पीएम मोदी की सात ‘एम्पावर्ड’ कमेटियां: ऊर्जा सुरक्षा पर जोर

बैठक से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में देश को आश्वस्त किया कि युद्ध के कारण उत्पन्न होने वाली किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सरकार तैयार है। उन्होंने घोषणा की कि एलपीजी, पेट्रोलियम और आवश्यक सेवाओं की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सात नए ‘अधिकार संपन्न समूहों’ (Empowered Groups) का गठन किया गया है। ये समूह नियमित रूप से बाजार का आकलन करेंगे और प्रधानमंत्री कार्यालय को सुझाव देंगे। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में देश में तेल और गैस के भंडार पर्याप्त हैं और जनता को घबराने की आवश्यकता नहीं है।

कूटनीतिक परीक्षा: भारत के लिए आगे की राह

सर्वदलीय बैठक में शामिल विपक्षी नेताओं ने मांग की कि भारत को पश्चिम एशिया में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कांग्रेस की ओर से तारिक अनवर और मुकुल वासनिक ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी ऐतिहासिक गुटनिरपेक्ष छवि और शांतिदूत की भूमिका को पुनर्जीवित करना चाहिए। सरकार की ओर से हरदीप पुरी ने भरोसा दिलाया कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर कम से कम हो, इसके लिए रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) का उपयोग किया जा रहा है।

राष्ट्रीय एकता बनाम राजनीतिक मतभेद

पश्चिम एशिया का यह संकट भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि एक बड़ी परीक्षा है। जहां एक ओर सरकार अपनी ‘एम्पावर्ड कमेटियों’ के माध्यम से आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने में जुटी है, वहीं विपक्ष का विरोध और अविश्वास सरकार की राह में बाधा बन सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि सर्वदलीय बैठक से निकला ‘मंथन’ भारत की विदेश नीति को कितनी स्पष्टता और मजबूती प्रदान करता है।

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