West Bengal Voter List: बंगाल मतदाता सूची विवाद, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अधिकारियों की लिस्ट सौंपने का दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह कल शाम 5 बजे तक 8,505 ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची चुनाव आयोग को सौंपे। राज्य में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के दौरान अधिकारियों की कमी और 1.36 करोड़ वोटरों के नाम में विसंगतियों को लेकर मचे घमासान के बीच कोर्ट ने आपत्तियों की समय सीमा भी एक हफ्ते बढ़ा दी है।

West Bengal Voter List

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 9, 2026

West Bengal Voter List: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के ‘स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर जारी कानूनी लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर है। सोमवार, 9 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए ममता बनर्जी सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य सरकार से कहा है कि वह उन 8,505 ‘बी रैंक’ अधिकारियों की विस्तृत सूची तुरंत चुनाव आयोग (EC) को सौंप दे, जिन्हें वह माइक्रो ऑब्जर्वर के रूप में तैनात करना चाहती है। कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और समयबद्धता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

ममता बनर्जी का कोर्ट में विरोध: माइक्रो ऑब्जर्वर्स की नियुक्ति पर उठाए थे सवाल

इस मामले की जड़ें 4 फरवरी को हुई पिछली सुनवाई में हैं, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अदालत में पेश हुई थीं। उन्होंने एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए थे। ममता बनर्जी ने विशेष रूप से अन्य राज्यों से माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने के आयोग के फैसले का कड़ा विरोध किया था। उनका तर्क था कि बाहरी अधिकारी स्थानीय भाषा और जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं होते, जिससे प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि, तब चुनाव आयोग ने दलील दी थी कि राज्य सरकार ने पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए, इसलिए उन्हें मजबूरन बाहर से मैनपावर बुलानी पड़ रही है।

राज्य सरकार की दलील: 8,505 अधिकारी देने को तैयार है बंगाल प्रशासन

सोमवार की सुनवाई के दौरान बंगाल सरकार के वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने सीजेआई सूर्यकांत की बेंच को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार माइक्रो ऑब्जर्वर के महत्वपूर्ण कार्य के लिए अपने 8,505 ‘बी रैंक’ के अधिकारी देने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस पर सीजेआई ने सकारात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि स्थानीय अधिकारियों की नियुक्ति एक बेहतर विकल्प है क्योंकि वे स्थानीय परिस्थितियों और भौगोलिक स्थिति को बाहरी लोगों की तुलना में अधिक सूक्ष्मता से समझते हैं। कोर्ट ने माना कि स्थानीय प्रशासन का सहयोग चुनावी मशीनरी को अधिक प्रभावी बनाता है।

सीजेआई की फटकार: “सूची देने में देरी क्यों की गई?”

हालांकि, सुनवाई के दौरान जब चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि उन्हें अभी तक न तो अधिकारियों की कोई सूची मिली है और न ही कोई अधिकारी रिपोर्ट करने पहुँचा है, तो सीजेआई का रुख कड़ा हो गया। उन्होंने बंगाल सरकार को फटकार लगाते हुए कहा, “पिछली सुनवाई 4 फरवरी को हुई थी। यदि आप 5 फरवरी को ही यह लिस्ट सौंप देते, तो चुनाव आयोग अब तक उन पर विचार कर अपना फैसला ले चुका होता।” कोर्ट ने राज्य सरकार की देरी पर नाराजगी जताते हुए इसे प्रक्रिया में अनावश्यक बाधा माना और जल्द से जल्द अनुपालन के निर्देश दिए।

मतदाता सूची का विशेष संशोधन: क्यों अहम है यह प्रक्रिया?

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का यह विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision) आने वाले चुनावों के मद्देनजर अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें फर्जी मतदाताओं के नाम हटाने और नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया शामिल है। माइक्रो ऑब्जर्वर्स की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी राजनीतिक दबाव या पक्षपात के संपन्न हो। बाहरी बनाम स्थानीय अधिकारियों का यह विवाद अब सुलझता नजर आ रहा है, बशर्ते राज्य सरकार अदालती आदेश का पालन करते हुए तुरंत अधिकारियों की सूची साझा करे।

चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच समन्वय की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। यदि अधिकारियों की सूची समय पर दी जाती है, तो बाहरी माइक्रो ऑब्जर्वर्स की आवश्यकता कम हो जाएगी, जो मुख्यमंत्री की प्रमुख मांग थी। हालांकि, आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि वह इन अधिकारियों की योग्यता और निष्पक्षता की जांच करने के बाद ही उन्हें ड्यूटी पर तैनात करेगा। अब मंगलवार और आने वाले दिनों की प्रगति यह तय करेगी कि बंगाल में मतदाता सूची का काम कितनी शांति और पारदर्शिता से पूरा होता है।

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