UP Politics: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों शब्दों के बाणों की बौछार हो रही है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बीच ‘शंकराचार्य’ के पद और कानून की व्याख्या को लेकर एक नई रार छिड़ गई है। सदन की कार्यवाही से शुरू हुआ यह विवाद अब निजी हमलों और ‘संस्कार बनाम अहंकार’ की बहस में तब्दील हो गया है।
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सदन में मुख्यमंत्री योगी की दो टूक टिप्पणी
बताते चले कि, विधानसभा में 13 फरवरी को चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि देश में कानून का शासन सर्वोपरि है और कोई भी शंकराचार्य कानून से ऊपर नहीं है। उन्होंने पद की गरिमा और नाम के उपयोग पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा कि हर कोई खुद को ‘शंकराचार्य’ नहीं लिख सकता। मुख्यमंत्री के इस बयान ने न केवल सदन के भीतर बल्कि राज्य के धार्मिक और राजनीतिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी है। बीजेपी समर्थकों ने इसे कानून की सर्वोच्चता बताया, तो विपक्ष ने इसे संतों का अपमान करार दिया।
सपा अध्यक्ष ने पद की गरिमा पर उठाए सवाल
अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के संबोधन को अभद्र और निंदनीय करार देते हुए सोशल मीडिया पर अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने लिखा कि शंकराचार्य जी जैसे परम पूज्य पद के बारे में ऐसी भाषा का प्रयोग करना ‘शाब्दिक हिंसा’ और पाप है। अखिलेश ने उन भाजपा विधायकों को भी घेरे में लिया जिन्होंने इस बयान पर सदन में मेजें थपथपाईं। सपा मुखिया ने तंज कसते हुए कहा, “पहन ले कोई जैसे भी चोले, पर उसकी वाणी उसकी असलियत की पोल खोल देती है।” उन्होंने दावा किया कि जनता सड़क पर उतरकर सरकार के इस अहंकार का जवाब देगी।
भ्रष्टाचार के लगाए गंभीर आरोप
राजनीतिक बयानों के बीच अखिलेश यादव ने महाकुंभ के प्रबंधन और वहां हुई मौतों के आंकड़ों पर भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार हकीकत छुपा रही है और ‘कैश मुआवजे’ की आड़ में भ्रष्टाचार का नया रास्ता निकाला गया है। अखिलेश ने सीधा सवाल पूछा कि जिन पीड़ितों तक मुआवजा नहीं पहुंचा, उनका पैसा किसकी जेब में गया? उन्होंने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन्हें अपने ऊपर लगे मुकदमे हटवाने के लिए सत्ता का सहारा लेना पड़ा, उन्हें दूसरों के धार्मिक पदों पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
अहंकार बनाम संस्कार’ की बहस
अखिलेश यादव ने अपने हमले को और तेज करते हुए कहा कि जब अहंकार बोलता है तो संस्कार विकार में बदल जाते हैं। उन्होंने ‘कानून का शासन’ शब्द के प्रयोग पर तंज करते हुए पूछा कि क्या सरकार इस अपमानजनक भाषा के लिए प्रायश्चित करेगी या सदन दोबारा बुलाएगी? उन्होंने दावा किया कि “जब मुंह खोला तब बुरा बोला” जैसी कहावतें अब प्रदेश के नेताओं पर सटीक बैठ रही हैं। सपा प्रमुख ने चेतावनी दी कि आगामी विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता इस अपमान का राजनीतिक जवाब देगी और भाजपा के अहंकार को चकनाचूर कर देगी।









