Haryana News: हरियाणा में शासन और प्रशासन के स्तर पर नियमों के पालन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। राज्य की 23 में से 13 नगर परिषदों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पदों पर तैनाती को लेकर नियमों का उल्लंघन किए जाने का आरोप लगा है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत कुमार ने इस मामले में राज्य के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आला अधिकारियों को पत्र लिखकर तीखी आपत्ति जताई है। यह विवाद मुख्य रूप से ‘हरियाणा नगरपालिका अधिनियम 1973’ के प्रावधानों के कथित उल्लंघन से जुड़ा है।
क्या है नियमों का उल्लंघन?
अधिवक्ता हेमंत कुमार के अनुसार, हरियाणा नगरपालिका अधिनियम 1973 के तहत नगर परिषदों में सीईओ के पद के लिए एक विशिष्ट रैंक निर्धारित की गई है। कानून के मुताबिक, इन पदों पर ‘एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर’ (EAC) यानी अतिरिक्त सहायक आयुक्त रैंक के अधिकारियों को ही तैनात किया जाना चाहिए। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि राज्य की 13 प्रमुख नगर परिषदों में इस मानक को दरकिनार कर दिया गया है।
वर्तमान में भिवानी, चरखी दादरी, फतेहाबाद, हांसी, झज्जर, जींद, कैथल, नारनौल, नूंह, पलवल, रेवाड़ी, सिरसा और थानेसर (कुरुक्षेत्र) की नगर परिषदों में ऐसे अधिकारी सीईओ के रूप में कार्यरत हैं, जो निर्धारित ‘ईएसी’ रैंक के पात्र नहीं हैं। अधिवक्ता का तर्क है कि जब राज्य की विधानसभा ने कानून बनाकर इन पदों के लिए न्यूनतम योग्यता और रैंक तय कर दी है, तो कार्यपालिका (सरकार) के पास कानून की अनदेखी करने या उससे निचले स्तर के अधिकारियों को नियुक्त करने का कोई कानूनी अधिकार शेष नहीं रह जाता।
प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे सवाल
यह मामला सीधे तौर पर प्रशासनिक दक्षता और संवैधानिक अनुपालन से जुड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नगर परिषद जैसे महत्वपूर्ण निकायों में सीईओ का पद काफी जिम्मेदारी वाला होता है, जहां विकास कार्यों की निगरानी और नगरीय सेवाओं का संचालन किया जाता है। अधिनियम में ईएसी रैंक को इसलिए अनिवार्य बनाया गया होगा ताकि संबंधित अधिकारी के पास प्रशासनिक अनुभव और निर्णय लेने की क्षमता का सही स्तर हो।
हेमंत कुमार ने अपने पत्र में इसे कानून की खुलेआम अवहेलना करार दिया है। उनका कहना है कि सरकारी विभागों द्वारा इस तरह की नियुक्तियां न केवल गलत परंपरा डालती हैं, बल्कि इससे नागरिक सुविधाओं के प्रबंधन पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
सरकार की अगली प्रतिक्रिया का इंतजार
इस खुलासे के बाद शहरी स्थानीय निकाय विभाग और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लाजमी हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार हाई कोर्ट के वकील द्वारा उठाए गए इस कानूनी बिंदु का संज्ञान लेती है? क्या इन 13 नगर परिषदों में नियुक्त किए गए अधिकारियों को हटाकर नियमानुसार पदोन्नति या तैनाती की जाएगी?
फिलहाल, प्रशासन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है। राज्य में सुशासन के दावों के बीच, नियमों के इस तरह के उल्लंघन ने विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सरकार को घेरने का एक नया मुद्दा दे दिया है। देखना यह होगा कि क्या सरकार सुधार की दिशा में कदम उठाती है या यह मामला केवल फाइलों में दबकर रह जाता है।










